Friday, 19 November 2021

Re Kabira 060 - अभी तक कोई सोया नहीं

--o Re Kabira 060 o--

 

अभी तक कोई सोया नहीं 

सामने वाले घर में आज भी, अभी तक कोई सोया नहीं 

या तो वो गुम है क़िताबों में - अख़बारों में, या फिर खोया हुआ है ख़यालों में 

या तो वो हक़ीक़त से है अनजान, या फिर है बहुत परेशान 

या तो वो है बिल्कुल अकेला, या फिर जमा हुआ है दोस्तों का मेला 


सामने वाले घर में आज भी, अभी तक कोई सोया नहीं 

या तो वो है किसी से डरा हुआ, या फिर है हाथ में प्याला भरा हुआ 

या तो वो है किसी के इख़्तेयार में, या है किसी के इंतज़ार में 

या तो वह है बहुत ही थका हुआ, या चाह कर भी सो न सका 


सामने वाले घर में आज भी, अभी तक कोई सोया नहीं 

में भी तो अब तक सोया नहीं, नींद का कोई पता नहीं 


आशुतोष झुड़ेले
Ashutosh Jhureley

--o Re Kabira 060 o--


Wednesday, 17 November 2021

Re Kabira 059 - क्या ढूँढ़ते हैं ?

--o Re Kabira 059 o--




आप मेरी सुकून की नींद को मौत कहते हैं, और फिर अपने  ख्वाबों मे मुझे ढूँढ़ते हैं 

अजीब इत्तेफ़ाक़ है की आप मुझसे भागते हैं,और फिर साथ फुर्शत के दो पल ढूँढ़ते हैं 

कभी आप मेरे काम तो तमाशा कहते हैं, और फिर कदरदानों की अशर्फियाँ ढूँढ़ते हैं 

देखिये आप मुझे वैसे तो दोस्तों में गिनते हैं, और फिर मुझमें अपने फायदे ढूँढ़ते हैं 

कभी आप मेरे साथ दुनिया से लड़ने चलते हैं, और फिर दुश्मनों में दोस्त ढूँढ़ते हैं 

ओ रे कबीरा ! लिखते नज़्म गुमशुम एक कोने में, और फिर भीड़ में चार तारीफें ढूँढ़ते हैं


आशुतोष झुड़ेले
Ashutosh Jhureley

--o Re Kabira 059 o--

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