Wednesday, 9 October 2019

Re Kabira 044 - कुछ ख़ाली ख़याल

--o Re Kabira 044 o--


कुछ ख़ाली ख़याल 

ख़ाली कमरे की मेज़ पर बैठे-बैठे, कुछ ख़ाली ख़याल  लिख पड़ा .. 

ख़ाली तो प्याली थी, जिसमे अब ग़र्म काली बिना शक्कर की चाय है
और ख़ाली वो मेज़बान भी था, जिसने रुक कर किया एहतिराम बुज़ूर्ग का ...

ख़ाली तो काँच के ग्लास है, जो सजा रखे हैं किताबों के बीच उस अलमारी पर 
और ख़ाली वो क़िताब के पन्ने भी है, जो किसी ने नहीं पढ़े अब तक ...

वैसे ख़ाली तो पड़ी है वो महफ़िल की बोतल, बीवी का गुबार निकलेगा जिस पर 
और ख़ाली वो सोफ़े का कोना भी होगा, जिस पर देखी थी दो-तीन सिनेमा कल ...

ख़ाली तो घर भी लगता है, जब होते हैं बच्चे इधर-उधर 
और ख़ाली वो आँगन  वहां भी हैं, जहाँ घरवाली-घरवाले करते है इंतेज़ार त्योहरों पर  ...

वहां ख़ाली तो दीवार है, जिसे सजना है एक तस्वीर से इस दिवाली पर 
और ख़ाली वो चित्र भी है, जिसे रंगा नहीं रंगसाज़ ने अभी तक ...

आज ख़ाली तो सड़क हैं, जहाँ ज़श्न मनता है किसी और की  जीत पर 
और ख़ाली वो चौराहे-बाज़ार भी हैं, जहाँ से निकला था जलूस जुम्मे पर ...

ख़ाली तो धमकियाँ हैं, जो भड़का देतीं हैं दंगे किसी के इशारे पर 
और ख़ाली वो ब्यान भी हैं, जो धकेलते हैं मासूमों को दहशत की राह पर ... 

ख़ाली लगती उनकी बातें, जो डरते हैं चुनौती से 
और ख़ाली तो भैया वो वादे भी, जो नेता करते है पायदानों से  ...

देखिये .. खाली तो चेहरा है, जो मायुश है बिना किसी बात पर 
और हाँ .. ख़ाली वो ताली भी है, जो बजी थी तुम्हारी चापलूसी पर  ...

ज़रूरी बात ..  ख़ाली तो वक़्त है, थोड़ा सुस्ताने थोड़ा शौक़ फ़रमाने के लिये 
और ख़ाली तो शाम भी है, जिसे रोक रखा है दोस्तों पर मिटाने के लिए.... दोस्ती निभाने के लिए ...

ख़ाली तो मेरा दिमाग़ है, जिसे कहते है सब शैतान का घर 
और ख़ाली तो हमारा दिल भी है, कभी कभी भर जाता है सोच अच्छे बुरे पल... अच्छे और बुरे पल ... 

मज़े की बात ये है ... आज लिख डाली स्याही से कुछ ख़ाली शब्द, ख़ाली पन्नों पर.... 

*** आशुतोष झुड़ेले  ***

--o Re Kabira 044 o--

Monday, 7 October 2019

Re Kabira 043 - Happy Dussehra 2019

--o Re Kabira 043 o--



 
करिश्मे तो रोज़ होते हैं हमारे सामने, नज़र अंदाज़ हो जाते हैं हमारी उम्मीदों की आड़ में ..
कभी गर्मी में इंद्रधनुष के रंग और कभी बारिश के कीचड़ में कमल, छोड़ कर छोटी-छोटी खुशियां खोये हुए हैं हम ।

भूल गए किंतना इंतज़ार करते थे त्योहारों का हम, अब बस सोचते हैं कब मिलनेगे कुछ क्षण जब छलके क़दम ...
देखो बच्चों की शैतानी और याद करो पिटाई के बाद की मरहम, जब तब नहीं रुके कदम तो फिर आज क्यों रुके हम।

चलो आ गया दशहरा निकाल लो झालर-झंकार, जगमग कर लो अपना छोटा सा संसार ...
मि
टे-दोष हटे-क्रोध छटे-विवाद, हर तरफ हो आशाओं की.. खुशिओं की जय जय कार


... दशहरा पर आप सब को शुभकामनायेँ ...

--o आशुतोष झुड़ेले  o--

Happy Dussehra 2019
Ashutosh Jhureley

--o Re Kabira 043 o--

Wednesday, 20 March 2019

Re Kabira 0042 - Lets Spread Colours.. of Love

--o Re Kabira 0042 o--



सब बोलें न चढ़े कोई रंग, जब हो हर तरफ लाल रंग।  
छुप गया नीला आकाश, खो गया सतरंगी गगन।।

बट गए नारंगी-हरे रंग, थक गये हम देख काले-सफ़ेद रंग।  
दिखती नहीं रंगीन वादियां, तितलियों ने खोया रसिक ढंग।।

गर्म हो गया पवन का मन, लहरें भूल गयीं खनक छन-छन।    
वापस आने दो लकड़पन, हस लो सोच के चंचल बचपन।।  

लो जे आ गयी होली ले के बसंत, हर तरफ होगा बस रंग ही रंग।  
जो बोले न चढ़े  कोई रंग, चपेड़ दो उनको नीला-पीला संग प्रेम रंग।। 

।। होली है  ।।
।। Happy Holi ।। 

2019

Life is full of colours, don't let negativity take over and hide colours all around us. 
On the occasion of Holi lets celebrate Spring and spread colours.. colours of love.

आशुतोष
Ashutosh Jhureley


--o Re Kabira 0042 o--

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