Wednesday, 5 October 2022

Re Kabira 075 - क्षमा प्रार्थी हूँ

  --o Re Kabira 075 o--

क्षमा प्रार्थी हूँ

क्षमा प्रार्थी हूँ,
था मस्तक पर स्वार्थ चढ़ा, मेरी वाणी में था क्रोध बड़ा 
हृदय से न मोह उखड़ा, मेरी चाल में था अहँकार बड़ा
क्षमा प्रार्थी हूँ,
था में निराशा में खड़ा, मेरी बातों में था झूठ बड़ा
आलस्य में यूँ ही था पड़ा, मेरे विचारों को था ईर्ष्या ने जकड़ा
क्षमा प्रार्थी हूँ,
था मद जो मेरे साथ खड़ा, मेरी सोच को था लोभ ने पकड़ा 
क्षमा माँगने में जो देर कर पड़ा, नत-मस्तक द्वार में खड़ा 
क्षमा प्रार्थी हूँ, 
क्षमा का है व्यव्हार बड़ा, दशहरा का है जैसे त्योहार बड़ा
क्षमा का है व्यव्हार बड़ा, दशहरा का है जैसे त्योहार बड़ा

सियावर रामचंद्र की जय !!
... दशहरा पर आप सब को शुभकामनायेँ ...

आशुतोष झुड़ेले
Ashutosh Jhureley
@OReKabira

 --o Re Kabira 075 o--

Monday, 26 September 2022

Re Kabira 074 - भाग भाग भाग

 --o Re Kabira 074 o--

भाग भाग भाग

भाग भाग भाग, भाग भाग भाग
भाग तेज़ भाग, भाग तेज़ भाग
भाग भाग भाग, भाग भाग भाग
और तेज़ भाग, और तेज़ भाग
भाग भाग भाग, भाग भाग भाग
इधर भाग, उधर भाग, बस भाग

भाग भाग भाग, भाग भाग भाग
गिर फिर उठ, उठ फिर भाग
भाग भाग भाग, भाग भाग भाग
ठोकर से न रुक, चोट से न चूक
भाग भाग भाग, भाग भाग भाग
दिन भर भाग, रात भर भाग

भाग भाग भाग, भाग भाग भाग
चोरी कर भाग, धोखा देकर भाग
भाग भाग भाग, भाग भाग भाग
कुचल कर भाग, धकेल कर भाग
भाग भाग भाग, भाग भाग भाग
धुप में, ठण्ड में, बारिश में भाग
 
भाग भाग भाग, भाग भाग भाग
बीमारी में भाग, लाचारी में भाग
भाग भाग भाग, भाग भाग भाग
भूखे थके भाग, थके भूखे भाग
भाग भाग भाग, भाग भाग भाग
सो जाग खा भाग, खा सो जाग भाग

भाग भाग भाग, भाग भाग भाग
कोई न रोके, कोई न टोके
भाग भाग भाग, भाग भाग भाग
अकेले ही भाग, सबको ले भाग
भाग भाग भाग, भाग भाग भाग
साँसे उखड़े भाग, टांगे टूटे भाग

भाग भाग भाग, भाग भाग भाग
हँसते रोते भाग, रोते गाते भाग

भाग भाग भाग, भाग भाग भाग
भाग, भाग
कहाँ पहुँचना हैं?, है पता तुझको?
भाग, भाग
क्या छूटा?, है पता तुझको?
भाग भाग
क्या पाया?, है पता तुझको?
भाग क्यूँ भाग, क्यों भाग
भाग क्यूँ भाग, क्यों भाग

न भाग भाग भाग, न भाग भाग भाग
न भाग भाग भाग, न भाग भाग भाग

आशुतोष झुड़ेले
Ashutosh Jhureley
@OReKabira

 --o Re Kabira 074 o--

Friday, 2 September 2022

Re Kabira 073 - ख़रोंचे

 --o Re Kabira 073 o--

ख़रोंचे



किसको ज़रूरत है काँटीले तारों की,
वैसे ही बहुत ख़रोंचों के निशाँ है जिश्म पर

किसको चाहिये ख़्वाब भारी चट्टानों से,
ज़िन्दगी की लहरों ने क्या कम तोड़ा है टकरा कर  

किसको जाना धरा की दूसरी छोर तक,
चार कदमों का फासला ही काफी है चलो अगर

किसको उड़ना है आसमान के पार,
बस कुछ बादल चाहिये हैं जो बरसे जम कर

किसको बटोरना है दौलत सारे जहाँ की,
चकाचक की होड़ मे सभी लगे हुये हैं देखो जिधर 

किसको इकट्ठे करने सहानुभूति दिखाने वालों को,
चारों ओर हज़ारों की भीड़ है सारे बुत मगर

किसको चाह है किसी कि दुआ की,
लगता है बद-दुआ ही है जिसका हुआ असर 

किसको सहारा चाहिये मदहोशी का,
ये अभिमान का ही तो नशा है जो चढ़े सर

किसको हिसाब चाहिये हर पल का,
थोड़ा वक़्त तो निकाल सकते हैं साथ एक पहर

किसको लूटना है वाह-वाही सब की,
कभी-कभी तो हम बात कर सकतें हैं तारीफ़ कर

किसको पढ़ना है कवितायेँ शौर्य-सुंदरता की,
बस एक शब्द ही काफी है शुक्रिया-धन्यवाद कर 

किसको ज़रूरत है काँटीले तारों की,
वैसे ही बहुत ख़रोंचों के निशाँ है जिश्म पर



आशुतोष झुड़ेले
Ashutosh Jhureley
@OReKabira


 --o Re Kabira 073 o--

Saturday, 16 July 2022

Re Kabira 072 - बातें हैं बातों को क्या !!!

--o Re Kabira 072 o--

Re Kabira 072 - बातें है बातों को क्या

बातें हैं बातों को क्या 

बातों बातों में निकल पड़ी बात बातों की, 
कि बातों की कुछ बात ही अलग है 
मुलाकातें होती हैं तो बातें होती हैं, फिर मुलाकातों की बातें होती है
और मुलाकातें न हो तो भी बातें होती है

देखे तो नहीं, पर बातों के पैर भी होते होंगे,
कुछ बातें धीरे की जाती हैं, कुछ तेज़, कुछ बातें दबे पाँव निकल गयी तो दूर तक पहुँच जाती हैं 
कुछ बातें दिल को छु कर निकल जाती हैं, और कभी सर के ऊपर से 
कुछ बातें तो उड़ती-उड़ती, और कभी गिरती-पड़ती बातें आप तक पहुँच ही जाती है 

बातों के रसोईये भी होते होंगे, जो रोज़ बातें पकाते हैं 
कुछ लोग मीठी-मीठी बातें बनाते हैं, कुछ कड़वी बातें सुना जातें हैं
कभी आप चटपटी बातें करते हैं, तो कभी मसालेदार बातें हो जाती हैं  
और कुछ बातें तो ठंडाई जैसी होती है, दिल को ठंडक पहुंचा जाती हैं 

वैसे तो अच्छी बातें, बुरी बातें, सही बातें और गलत बातें होती हैं
बातों का वजन भी होता है, कुछ हलकी होती हैं तो कुछ बातें भारी हो जाती हैं
यूं तो कुछ लोग बातें छुपा लेते, तो कुछ बातों को रखकर चले जाते हैं,
कोई दबा देता है, और फिर कोई आकर बातों तो उछाल जाता है 

बातों में पकड़-छोड़ का खेल तो चलता ही रहता है,
जैसे कुछ लोग बातें पकड़ने में तेज़ होते हैं, तो कुछ बातें छोड़ते ही रहते हैं 
बातें तोड़-मरोड़ भी दी जातीं हैं, और कुछ बातें सीधी करना पड़ जाती है 
जब अतरंग बातें होने लगे, तो बातें बहक भी जातीं है, 

बातें बनती है, बातें बिगड़ती हैं, कभी सुलझ जाती हैं और कभी उलझ 
बातों की तो गहराई भी नापी जाती है, ऊंचाई भी और कभी लम्बाई भी  
बातों की गणित तो भूल ही गये, एक की दो, दो की चार, करके दस बातें तो रोज़ सुन ही लेते हैं 
और छोटी-मोटी बातें तो होती ही रहती हैं 

आम तौर पर सच्ची-झूठी, अजब-गजब बातें हर कहीं होती है, 
कुछ ख़ास बातें होती है, कुछ बहुत ही ख़ास, बिना बात किये भी कभी बात हो जाती है
कुछ बातें भीड़ में की जातीं हैं और कुछ अकेले में 
कभी-कभी खुद से भी बातें हो जाती हैं 

ज़्यादातर बातें वैसे तो बोल कर की जाती हैं
कुछ बातें चुप-चाप की जातीं है, कुछ लिखकर, और कुछ इशारे से 
कभी दिल से बातें की जाती हैं, कभी आँखों से 
और कभी कभी, जब किसी को समझ न आये तो लातों से भी की जातीं है 

बातें पैदा होती हैं, अपना एक जीवन जीतीं हैं और फिर बातें दफ़्न हो जाती हैं 
ओ रे कबीरा बातों की बातें करें तो बातें ख़त्म नहीं हो पायेंगी
तो कभी बहुत सारी बातों के बाद भी बातें समझ नहीं आती 
बातें हैं बातों का क्या, बातें होंगी तभी तो और बातों की बातें हो पायेंगी
बातें हैं बातों को क्या !!!


आशुतोष झुड़ेले
Ashutosh Jhureley
@OReKabira

--o Re Kabira 072 o--

Wednesday, 13 July 2022

Re Kabira 071 - कीमती बहुत हैं आँसू

--o Re Kabira 071 o--
 
कीमती बहुत हैं आँसू  - Ashutosh Jhureley - @OReKabira

कीमती बहुत हैं आँसू 

छलके तो ख़ुशी के, जो बहें तो दुःख के आँसू
कभी मिलन के, तो कभी बिछड़ने के आँसू

कभी सच बताने पर, कभी झूठ पकड़े जाने पर निकल आते आँसू
कभी कमज़ोरी बन जाते, तो कभी ताक़त बनते आँसू

कभी पीकर, तो कभी पोंछकर चलती ज़िन्दगी संग आँसू
कभी लगते मोतियों जैसे, तो कभी दिखते ख़ून के आँसू

कभी खुद को खाली कर देते, तो कभी सहारा बन जाते आँसू
कभी दरिया बन जाते, तो कभी सैलाब बन जाते ऑंसू

दिल झुमे तो, रब चूमे  तो पिघलते भी आँसू
कभी डर के मारे, कभी घबड़ाहट से आ जाते हैं आँसू

गुस्से में राहत देते, धोखे में आहात देते ऑंसू
कहते हैं बह जाने दो, दिल हल्का कर देंगे ये आँसू

दर्द का , चोटों का , तकलीफों का आइना आँसू
नफरत की ज़िद में, इश्क़ की लत जमते आँसू

मजबूरी के, लाचारी के, जीत के, हार के होते आँसू
सीरत तो नम होती इनकी, सूख भी जाते हैं आँसू

कवितओं में, कहानियों में, शेऱ-शायरियों में बस्ते ऑंसू
प्रेम के, भक्ति के, समर्पण के गवाह आँसू

कभी छोटे, कभी बड़े, बहुत काम के हैं ऑंसू
ओ रे कबीरा संजो के रखो, कीमती बहुत हैं आँसू


आशुतोष झुड़ेले
Ashutosh Jhureley
@OReKabira

--o Re Kabira 071 o--

Wednesday, 6 July 2022

Re Kabira 0070 - अभी बाँकी है

--o Re Kabira 070 o--

अभी बाँकी है

कभी ठहाके कभी छुपी हुई मुस्कुराहटें, हँसते हँसते रोना अभी बाँकी है
कुछ किस्से कुछ गप्पें, कुछ नयी और बहुत सी पुरानी कहानियाँ सुनना अभी बाँकी है 
हमने तो आप लोगों को पूरी तरह परेशान करा, आपका थोड़ा तो बदला लेना अभी बाँकी  है 
काफ़ी पिटाई करी खूब कान मरोड़े, अक्ल अभी भी हमको न आयी, 
...और डाँट खाना अभी बाँकी है

हम लोगों को आपने जैसे तैसे निबटा दिया, हमारी अंग्रेज औलादों को निबटना अभी बाँकी है 
खूब पैसे जोड़ लिए, खूब बचत कर ली, हमारे लिए ... अपने ऊपर कुछ खर्चना अभी बाँकी है 
बहुत भागा-दौड़ी, चिंता विंता हो गयी, कुछ पल फुर्सत से बिताना अभी बाँकी है 
कसर कोई छोड़ी नहीं हमारे लिए, हमारी परीक्षा तो अभी बाँकी है

बहुत से चुटकुले, बहुत सी अटकलें, आपका को बहुत सी महफ़िलों को चहकाना अभी बाँकी है
अहिल्या की कहानियाँ चल ही रही है, हमारे पप्पू की कारनामे सुनना अभी बाँकी है 
अकेले चाय पीने में बिलकुल मज़ा नहीं आता, खूब चाय पीना अभी बाँकी है 
आपकी मुस्कराहटों पर आपकी हँसी पर लाखों न्योछारावें अभी बाँकी है 

बहुत सारा प्यार और उससे ज्यादा आपका आशीर्वाद अभी बाँकी है 
ये तो बस trailer था. picture  पूरी अभी बांकी है 
बाँकी सब तो ठीक है, uncle का आपके लिए कोहिनूर लाना अभी बाँकी 
बस आप लोग ऎसे ही स्वस्थ रहें, और बहुत सी पार्टियां अभी बाँकी है 

आज तो golden jubilee है, diamond फिर platinum jubilee अभी बाँकी है 
कभी ठहाके कभी छुपी हुई मुस्कुराहटें, हँसते हँसते रोना अभी बाँकी है

Happy Anniversary


आशुतोष झुड़ेले
Ashutosh Jhureley
@OReKabira

--o Re Kabira 070 o--

Friday, 18 March 2022

Re Kabira 0069 - रंगों में घोली होली है

 --o Re Kabira 069 o--


रंगों में घोली होली है

रंगों में घोली होली है

देखो कैसी ये होली है,
हमने रंगों में घोली होली है

छिड़क तनिक गुलाल,
प्यार जताने की होली है

मार पिचकारी लाल रंग की,
शिक़वे मिटाने की होली है

सन दो कौसुम्भ की सुगंध में,
ये मानो भक्तों की होली है

गोबर की जो महक आये,
तो भैया भागो अंध-भक्तों की होली है

जहाँ नील ही नील दिखे,
समझो आज खूब खेली होली है

जरा सिन्दूर चढ़ा कर,
पुजारी ने भी खेली होली है

पीलक ने भी खेली,
मौसम बदलने के होली है

नारंगी-हरे रंग में फ़रक न दिखे,
तो ये असली होली है

राख में ढ़के हुए,
साधु-सन्यासियों ने खेली होली है

श्वेत टिका लगाए,
वृन्दावन के आश्रम में खिली होली है

माटी-कीचड़ में सने,
श्रमिक-किसानों की भी ये होली है

मिट्टी में लिपटे हुए,
माली के बच्चों ने खेली होली है

श्याम रंग में छुपे,
कुछ अतरंगों की होली है

रंगों की होदी में धकेल,
दोस्तों ने भी खेली होली है

चार लकीरें रंगो में लगाकर ही सही,
हिचकिचाहट से कुछ लोगों ने खेली होली है

कुछ गीली कुछ सूखी,
नीली-पीली, लाल-गुलाबी

सतरंगों में डूबी हुई,
आज खुशियों की होली है

रंगों में घोली होली है,
होली है भाई होली है..



आशुतोष झुड़ेले
Ashutosh Jhureley
@OReKabira

--o Re Kabira 069 o--

Friday, 25 February 2022

Re Kabira 0068a - I wish I were a cloud

 --o Re Kabira 068 o--


I wish I were a cloud,
a bit crazy cloud,
always lost in my own thoughts,
and everyone would have called me a crazy cloud,
winds would have carried my abode,
and would have changed colors with every season.

I wish I were a cloud,
a bit crazy cloud,
would have been adorned on eyes of the sun,
and would have covered the moon in a cashmere shawl,
would have been a prince's horse,
and wings of a beautiful fairy.

I wish I were a cloud,
a bit crazy cloud,
would have played hide & seek with the stars,
and would have flown high with the birds,
would have thundered when sad,
and would have rained in joy.

I wish I were a cloud,
a bit crazy cloud,
would have been a roof on top of a couple in love,
and would have danced wild
would have been a story, a poem, or a song
and would be been a colorful painting.

I wish I were a cloud,
a bit crazy cloud, 
would have been impersonator dreaming all day,
and everyone would have been jealous,
would have had boundless dreams,
and would have been free like a bird.
I wish I were a cloud,
a bit crazy cloud, 
I wish I were a cloud,
a bit crazy cloud.



आशुतोष झुड़ेले
Ashutosh Jhureley
@OReKabira


 --o Re Kabira 068 o--

Re Kabira 0067 - लता जी का तप

--o Re Kabira 067 o--



माँ सरस्वती का तप करो तो ऐसे,
किया जप लता जी ने है जैसे,
आत्मा ने छोड़ा नहीं देह तब तक,
कर न ली अंतिम वंदना जब तक ।

#LataMangeshkar
1929 - 2022
🙏🏽
#RIPLataMangeshkar


आशुतोष झुड़ेले
Ashutosh Jhureley
@OReKabira

--o Re Kabira 067 o--

Re Kabira 0068 - क़ाश मैं बादल होता


--o Re Kabira 068 o--

क़ाश मैं बादल होता


क़ाश मैं बादल होता,
थोड़ा पागल होता,
अपनी मौज़ में मशग़ूल होता,
कहते लोग मुझे आवारा बादल,
हवा के झोंकों पर मेरा घर होता,
हर मौसम रंग बदलता.

क़ाश मैं बादल होता
थोड़ा पागल होता,
कभी सूरज का काजल,
कभी चंदा का आँचल होता,
कभी राजकुमार का घोड़ा,
कभी सुन्दर परी के पंख होता.

क़ाश मैं बादल होता
थोड़ा पागल होता,
तारों के संग आखँ मिचोली खेलता,
पँछियों संग ऊँची उड़ान भरता,
रूठ जाने पर ज़ोर गरजता,
खुश होकर फिर खूब बरसता.

क़ाश मैं बादल होता
थोड़ा पागल होता,
आशिक़ों की छप्पर होता,
दीवानों जैसे मस्त झूमता,
कहानी बनता, कविता बनता, गीत बनता,
रंगों भी खूब समता.

क़ाश मैं बादल होता
थोड़ा पागल होता,
बहरूपिया बन ख्याल बुनता,
सब मुझसे जलते आहें भरते,
सोच मेरी आज़ाद होती,
आज़ाद मैं होता जैसे परिंदा,
क़ाश मैं बादल होता
थोड़ा पागल होता,
क़ाश मैं बादल होता
थोड़ा पागल होता.


आशुतोष झुड़ेले
Ashutosh Jhureley
@OReKabira



--o Re Kabira 068 o--

Friday, 28 January 2022

Re Kabira 0066 - स्याही की व्यथा

--o Re Kabira 066 o--

स्याही की व्यथा


स्याही की व्यथा

स्याही ही हूँ,
लिखती हूँ ख़बर कभी ख़ुशी की और कभी ग़म की
लिखती हूँ चिट्ठी कभी इंतेज़ार की और कभी इज़्हार की
लिखती हूँ कहानी कभी कल्पना की और कभी हक़ीक़त की

स्याही ही हूँ,
लिखती हूँ परीक्षा कभी जीवनी के लिए और कभी जीवन के लिए
लिखती हूँ कविता कभी दर्द छुपाने के लिए और कभी दिखाने के लिए
लिखती हूँ कटाच्छ कभी झंझोलने के लिए और कभी सोचने के लिए

स्याही ही हूँ,
लिखती हूँ भजन भगवान् को बुलाने के और कभी भगवान् के समीप जाने के
लिखती हूँ फरमान कभी आज़ादी के और कभी गुलामी के
लिखती हूँ पैगाम कभी समझातों के और कभी साज़िशों के

स्याही ही हूँ,
लिखती हूँ यादें कभी याद करने के लिए और कभी भूल जाने के लिए
लिखती हूँ चुटकुले-व्यंग हॅसने के लिए और हँसाने लिए
लिखती हूँ कथा-आत्मकथा कभी महापुरषों के लिए और कभी दुष्टोँ के लिए

स्याही ही हूँ,
लिखती हूँ शिकायतें कभी बदलाव के लिए और कभी न बदलने के लिए
लिखती हूँ गाथाएँ कभी इतिहास बतलाने के लिए और कभी बहकाने के लिए 
लिखती हूँ संविधान कभी राष्ट्र बनाने के लिए और कभी बटवाने के लिए

स्याही ही हूँ,
लिखती हूँ रंगों में कभी बस रंग मत समझ लेना
लिखती हूँ कागज़ पर कभी तलवार से काम मत समझ लेना
लिखती हूँ शांति के गीत कभी तूफान से काम मत समझ लेना

स्याही ही हूँ,
लिखती हूँ तुम्हारे के लिए कभी मेरे लिए भी लिख देना
लिखती हूँ की न मेरे लिए लिख सको तो कभी कभी अपने लिए लिखते रहना
लिखती हूँ हमेशा किसी न किसी के लिए कभी मेरे लिए भी लिख देना


आशुतोष झुड़ेले
Ashutosh Jhureley

--o Re Kabira 066 o--

Friday, 21 January 2022

Re Kabira 065 - वो कुल्फी वाला

--o Re Kabira 065 o--

वो कुल्फी वाला

वो कुल्फी वाला 

जैसे कल ही की बात हो,
जब सुनते थे हम घंटी वो,
भागे चले आते ले जो पैसे हों,
दूध-मलाई-केसर-पिस्ता कुल्फी ले लो,

घेर लेते थे ठेला दिखलाते चवन्नी उसको,
लड़ते थे सबसे पहले अपनी बारी को,
कभी गिर जाती थी कुल्फी टूट, 
दे देता था दूसरी बोल बेटा उदास मत हो 

आँखों में चमक, मुँह में पानी अब भी आता
चाहे हाथ में कुल्फी हो-न-हो,
बचपन की शरारतें वापस आ जाती, 
देख लाल कपड़े में लिपटे मटके को 

न जाने कहाँ चला गया ठंडी कुल्फी वाला वो,
वो कुल्फी वाला,
याद दिलाता बचपन कुल्फी वाला वो,
वो कुल्फी वाला...


आशुतोष झुड़ेले
Ashutosh Jhureley

--o Re Kabira 065 o--


Tuesday, 18 January 2022

Re Kabira 064 - कुछ सवाल?

--o Re Kabira 064 o--


कुछ सवाल?

खुशियां समिट गयीं, आशाएँ बिखर गयीं
कुछ तो ढूंढ रहा है बंदा?
रिश्ते अटक गए, नाते चटक गए
कुछ न समझे है ये बाशिंदा?

उसूल लुट गए, सुविचार मिट गए 
क्यों नहीं हो रही निंदा?
झूठ जीत गया, सच बदल गया
क्यों नहीं हैं हम शर्मिंदा?

दुआयें गुम गयीं, आशीर्वाद कम गया
किसे पुकारे अब नालंदा?
बहुत तप हो गए, रोज़ व्रत हो गए
किसे भक्ति दिखाये रे काबिरा, रे गोविंदा?

सुकून चला गया, चैन न रह गया
कैसे हैं लोग यूँ ज़िंदा?
लालच बस गयी, तृष्णा रह गयी
कैसे निकालोगे ये फंदा?

शहर बस गए, गांव घट गए
कहाँ बनेगा मेरा घरौंदा?
ख़्वाब रह गए, सपने बह गए
कहाँ भटक रहा परिंदा?


आशुतोष झुड़ेले
Ashutosh Jhureley

--o Re Kabira 064 o--


Monday, 10 January 2022

Re Kabira 0063 - ये घड़ी और वो घड़ी

 --o Re Kabira 063 o--

ये घड़ी, और वो घड़ी

ये घड़ी, और वो घड़ी

 दीवार पर एक घड़ी, कलाई पर दूसरी घड़ी
घर के हर कमरे में अड़ी है एक घड़ी 
रोज़ सुबह जगाती, इंतेज़ार कराती है घड़ी 
कुछ सस्ती, कुछ महँगी, गहना भी बन जाती है घड़ी 

इठलाती, नखरे दिखाती, हमेशा टिक-टिकाती है घड़ी 
कुछ धीरे चलती, कुछ तेज़ चलती है घड़ी 
कभी रुक जाती है, पर समय ज़रूर बताती है घड़ी,
कुछ अजब ही जुड़ी है मुझसे ये घड़ी, और वो घड़ी

सुख़ की, दुःख की, ख़ुशियों की भी होती है घड़ी 
परेशानियाँ भी आती हैं घड़ी-घड़ी
तेज चले तो इंतेहाँ की, धीरे चले तो इंतज़ार की है घड़ी 
दौड़े तो दिल की, थक जाओ तो सुस्ताने की है घड़ी 

बच्चों के खेलने जाने की घडी, बूढ़ी आखों के लिए प्रतीक्षा की घड़ी 
जीत की, हार की, भागने की, सम्भलने की घड़ी 
यादों की, कहानियों की, किस्सों की, गानो की भी होती है घड़ी 
कुछ अजब ही जुड़ी है मुझसे ये घड़ी, और वो घड़ी

किसी के आने की घड़ी, किसी के जाने की घड़ी 
किसी न किसी बहाने की भी होती है घड़ी 
कोई चाहे धीमी हो जाये ये घड़ी, रुक जाए ये घड़ी
कोई चाहे बस किसी तरह निकल जाये ये घड़ी 

कभी फैसले की घड़ी, तो कभी परखने की घड़ी 
कभी हक़ीकत की घड़ी, तो कभी यकीन की घड़ी
कभी व्यस्त होती घड़ी, तो कभी पुरसत की घड़ी,
कुछ अजब ही जुड़ी है मुझसे ये घड़ी, और वो घड़ी

तूफ़ान की घडी, सुक़ून की घड़ी,
इंक़लाब की, क्रांति की भी होती है घड़ी 
यात्रा की घड़ी, वार्ता की घड़ी, 
युद्ध का शांति का भी ऐलान करती घड़ी 

बदलाव की घड़ी, ग्लानि की घड़ी
समर्पण की घड़ी, आत्मनिरिक्षण की घड़ी,
सच की, झूठ की, प्रार्थना की घड़ी 
इंसान की, शैतान की, भगवान् की घड़ी 

चलती रहे वक़्त के साथ, बस वो है घड़ी 
कोई चाहे या न, चलने का नाम है घड़ी 
थम गयी वो तेरी साँसे है, चल रही अब भी घड़ी 
कुछ अजब ही जुड़ी है मुझसे ये घड़ी, और वो घड़ी


आशुतोष झुड़ेले
Ashutosh Jhureley

--o Re Kabira 063 o--


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