Saturday, 27 June 2020

Re Kabira 056 - मेरी किताब अब भी ख़ाली



--o Re Kabira 056 o--

मेरी किताब अब भी ख़ाली

बारिश की उन चार बूँदों का इंतेज़ार था धरा को,
जाने किधर चला गया काला बादल आवारा हो 

आग़ाज़ तो गरजते बादलों ने किया था पूरे शोर से,
आसमाँ में बिजली भी चमकी पुरज़ोर चारों ओर से 

कोयल की कूक ने भी ऐलान कर दिया बारिश का,
नाच रहे मोर फैला पंख जैसे पानी नहीं गिरे मनका 

ठंडी हवा के झोंके से नम हो गया था खेतिहर का मन, 
टपकती बूँदों ने कर दिया सख़्त खेतों की माटी को नरम 

मिट्टी की सौंधी ख़ुश्बू का अहसास मुझे है होने लगा,
किताबें छोड़ कर बच्चों का मन भीगने को होने लगा 

खुश बहुत हुआ जब देखा झूम कर नाचते बच्चों को,
बना ली काग़ज़ की नाव याद कर अपने बचपन को 

बहते पानी की धार में बहा दी मीठी यादों की नाव को, 
सोचा निकल जाऊँ बाहर गीले कर लूँ अपने पाँव को 

रुक गया पता नहीं क्यों बेताब सा हो गया मेरा मन,
ख़ाली पन्नो पर लिखने लगा कुछ शब्द हो के मगन 

तेज़ थी बारिश था शोर छत पर था संगीत गिरती बूँदों में, 
तेज़ थी धड़कन था मन व्याकुल थी उलझन काले शब्दों में 

लिखे फिर काटे फिर लिखने का सिलसिला चला रात भर,
बुन ही डाला ख़्यालों के घोंसले को थोड़े पीले-गीले पन्ने पर 

थम गयी बारिश फिर हो गयी ख़ाली मेरी चाय की प्याली,
रुकी गयी कलम टूट गयी नींद मेरी किताब अब भी ख़ाली


मेरे जीवन की किताब अब भी है ख़ाली
आशुतोष झुड़ेले
Ashutosh Jhureley

--o Re Kabira 056 o--

Inspirational Poets - Ramchandra Narayanji Dwivedi "Pradeep"

Ramchandra Narayanji Dwivedi "Pradeep" (कवि प्रदीप) was an Indian poet and songwriter who gave patriotic Hindi movies some songs that became larger calls. He adopted the pen name "Pradeep" and became renowned as Kavi Pradeep. His most famous song is "Aye Mere Watan Ke Logo" (ऐ मेरे वतन के लोगों), sung by Lata Mangeshkar, made then Prime Minister of India Pt. Nehru cry. Sharing my favorite poems of "Pradeep" here:


कभी धुप कभी छाँव
सुख दुःख दोनों रहते जिसमे जीवन है वो गाँव
कभी धुप कभी छाँव, कभी धुप तो कभी छाँव

भले भी दिन आते जगत में, बुरे भी दिन आते
कड़वे मीठे फल करम के, यहाँ सभी पते
कभी सीधे कभी उलटे पड़ते, अजब समय के पाँव
कभी धुप कभी छाँव, कभी धुप तो कभी छाँव

क्या खुशियाँ क्या गम, ये सब मिलते बारी बारी
मालिक की मर्ज़ी पे, चलती ये दुनिया सारी
ध्यान से खेना जग में, बन्दे अपनी नाव
कभी धुप कभी छाँव, कभी धुप तो कभी छाँव



कभी कभी खुद से बात करो
कभी कभी खुद से बात करो,कभी खुद से बोलो।
अपनी नज़र में तुम क्या हो? ये मन की तराजू पर तोलो।
कभी कभी खुद से बात करो, कभी कभी खुद से बोलो।

हरदम तुम बैठे ना रहो.. शौहरत की इमारत में।
कभी कभी खुद को पेश करो आत्मा की अदालत में।
केवल अपनी कीर्ति न देखो.. कमियों को भी टटोलो।
कभी कभी खुद से बात करो, कभी कभी खुद से बोलो।

दुनिया कहती कीर्ति कमा के, तुम हो बड़े सुखी।
मगर तुम्हारे आडम्बर से, हम हैं बड़े दु:खी।
कभी तो अपने श्रव्य-भवन की बंद खिड़कियाँ खोलो।
कभी कभी खुद से बात करो, कभी कभी खुद से बोलो।

ओ नभ में उड़ने वालो, जरा धरती पर आओ।
अपनी पुरानी सरल-सादगी फिर से अपनाओ।
तुम संतो की तपोभूमिपर मत अभिमान में डालो।
अपनी नजर में तुम क्या हो? ये मनकी तराजू में तोलो।

कभी कभी खुद से बात करो, कभी कभी खुद से बोलो।

Wednesday, 17 June 2020

Re Kabira 055 - चिड़िया

--o Re Kabira 055 o--


चिड़िया

इधर फुदकती उधर चहकती,डर जाती फिर उड़ जाती
तिनके चुनती थिगड़े बुनती, झट से पेड़ों में छुप जाती
सुबह होते शाम ढलते, मीठे गीत फिर सुनाने आ जाती
दाना चुगने पानी पीने, वापस फिर मेरे आँगन में आ जाती

कभी बारिश कभी तूफान, भाँपते जाने कहाँ गायब हो जाती 
कभी चील कभी कौये, देख क्यों तुम घबड़ा सी जाती 
बच्चे ढूंढे आँखें खोजें, जिस दिन तुम कहीं और चली जाती 
दाना चुगने पानी पीने, वापस फिर मेरे आँगन में आ जाती

गेहूँ खाती टिड्डे खाती, बागीचे के किसी कोने में घर बनाती 
तुम लाती चिड़ा लाता, बारी-बारी तुम चूजों को खिलाती 
खाना सिखाती गाना सिखाती, फिर बच्चों संग उड़ जाती
दाना चुगने पानी पीने, वापस फिर मेरे आँगन में आ जाती

सबेरे जाती साँझ आती, फिर झाड़ी में गुम हो जाती 
जल्दी उठाती देर तक बहलाती, जाने कब तुम सोने को जाती
कुछ दिन कुछ हफ्ते, तुम मेरे घर की रौनक बन जाती 
दाना चुगने पानी पीने, वापस फिर मेरे आँगन में आ जाती

आशुतोष झुड़ेले
Ashutosh Jhureley

--o Re Kabira 055 o--

Sunday, 14 June 2020

Re Kabira 054 - इतनी जल्दी थी

--o Re Kabira 054 o--


इतनी जल्दी थी

जाने की इतनी जल्दी थी सीधे ख़ुदा से क्यों बात कर ली,
जिस तरह चले गए ऐसी कोई भी बात इतनी बड़ी थी भली। 

इतनी तेज भागते रहे की साँस लेने फ़ुरसत मिली ही नहीं,
न तुमने देखा न तुमको देखा कब कदम थम गए बस वहीं। 

चिल्लाए तो बहुत पर आवाज़ पलट कर आयी ही नहीं,
हज़ारों दोस्त हैं पर एक को भी तकलीफ़ दिखाई दी नहीं। 

सारे दोस्त मुज़रिम हैं क्यों कल उससे बात नहीं कर ली,
जाने की इतनी जल्दी थी सीधे ख़ुदा से क्यों बात कर ली।

आशुतोष झुड़ेले
Ashutosh Jhureley

He couldn’t find someone to talk only option was to meet the God. All the friends are now feeling guilty why they didn’t speak with him yesterday.

#MentalHealthMatters #RIPSSR #JustTalk

--o Re Kabira 054 o--

Monday, 1 June 2020

Re Kabira 053 - बाग़ीचे की वो मेज़

--o Re Kabira 053 o--



बाग़ीचे की वो मेज़

बाग़ीचे की उस मेज़ पर हमेशा कोई बैठा मिला है
यहीं तो मेरी मुलाक़ात एक दिन उम्मीद से होने वाली है

अलग-अलग चेहरों को मुस्कुराते हुए देखा है
कभी सुकून से सुस्साते और कभी ज़िन्दगी से थके देखा है

बुज़ूर्ग आँखों को बहुत दूर कुछ निहारते देखा है
कभी ढलते सूरज में और कभी सितारों में खोया देखा है 

बच्चों को वहां पर खिलखिलाते हुये देखा है 
कभी झगड़ते हुए और कभी खुसफुसाते हुए देखा है 

जवाँ जोड़ों को भी गुफ़्तुगू में खोये हुए देखा है 
कभी हैरान परेशान और कभी शमाँ का लुफ़्त लेते देखा है  

अक्सर कोई तन्हाई के कुछ पल ढूंढ़ता दिखा है 
कभी आप में खोया सा और कभी सोच में डूबा दिखा है 

ज़नाब कोई खुदा से हिसाब माँगते भी दिखा है
कभी अपना हिस्सा लिए और कभी अपने टुकड़े के लिए लड़ते दिखा है 

बड़ी मुद्दत के बाद बाग़ीचे की वो मेज़ खाली है
यहीं तो मेरी मुलाक़ात आज उम्मीद से होने वाली है

*** आशुतोष झुड़ेले  ***

--o Re Kabira 053 o--

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