बार-बार जन्म लेता रहा तू - Hindi Poetry - Re Kabira 111
-- o Re Kabira 111 o -- बार-बार जन्म लेता रहा तू खूब धूम मची, 2 दशक - 14 लड़कियों के बाद कुल में लड़का जन्मा तू, रंग काला, बोलना सीखा नहीं—करिया कहलाया तू। फसल बह गई, घर बिक गया जिस बरस आया तू, अभी चलना सीखा नहीं, गोद में ही कोसा गया तू । मिट्टी ही तेरे खेल‑खिलौने, उसी में हँसता तू, दूर से ही पटाखे सुन दिवाली पर खुश होता तू। हर बार लगा क्यों सब से इतना अलग है तू, किसी न किसी बहाने बार‑बार जन्म लेता रहा तू। फटी किताबों के चित्रों में ही खोया रहा तू, नंगे पाँव मीलों स्कूल तक दौड़ता रहा तू। समझ न सका क्यों कक्षा के बाहर बैठाया गया तू, कई बार बिना वजह चोर कहलाया तू। कितने घरों की देहरी पार न कर पाया तू, मंदिर के बाहर ही मन्नतों के धागे बाँध आया तू। नमक‑पानी आधी रोटी, कितनी बार भूखा रोया, सोया तू, किसी न किसी बहाने बार‑बार जन्म लेता रहा तू। कभी तानों से, कभी गालियों से बौखलाया तू, लातें सहकर चुप अपने ही घ...