कुछ किस्से कहानियाँ - बऊ का भूत - Hindi Stories - Great Grandmother's Ghost - Re Kabira 124
बऊ का भूत अभी भी ऐसा लगता है मानो, बऊ कुठरिया में जीने पास वाले दरवाज़े पर ही बैठी है। पूर्णतः श्वेत केश, जैसे जीवन के सारे रंग उड़ गए हों। समय की मार से चेहरे पर झुर्रियाँ, मंद दृष्टि, बिना दांत के मुख में होंठ अन्दर धंसे हुए, वृदावस्था से टूटा हुआ देह। केवल पुरानी पतली सफेद धोती लपेटे, एक घुटना सीने से लगाए। दुसरे घुटने पर कांपते हाथ का सहारा लिए, पत्थर के ठन्डे फर्श पर, पिचकी हुई थाली और इधर-उधर लुढ़कता हुआ लोटा रखे, कुठरिया के दरवाज़े पर बैठी हों। घंटो सीढ़ियों पर थकी हुई कमजोर आँखें और कान लगाए, परछाइयों का पीछा करते बैठी रहतीं। जो भी, जब बी निकलता, उससे उम्मीद की रुकगा, कुछ कहेगा, कुछ सुनेगा। अकेली खुद से बड़-बड़ाती रहतीं। हम लोग जब भी निकलते, पास बुला कर पूँछती कौन हो, किसके मोड़ा हो। प्यार से पूरे चेहरे पर हाथ फेरती और गोदी में बैठा लेती। उनकी बस ये ही छवि अंकित है और ऐसे अंकित है जैसे कल की ही बात हो। बऊ, मेरी पर-दादी, का निधन जब मेरी आयु ४-५ वर्ष की होगी तब हो गया था। जब भी उनकी बात होती है, उनका चेहरा, उनके कपड़े, उनका कमरा साक्षात् सामने उभर कर आ जाता है। उनकी...