कुछ किस्से कहानियाँ - बऊ का भूत - Hindi Stories - Great Grandmother's Ghost - Re Kabira 128

बऊ का भूत 

अभी भी ऐसा लगता है मानो, बऊ कुठरिया में जीने पास वाले दरवाज़े पर ही बैठी है।  पूर्णतः श्वेत केश, जैसे जीवन के सारे रंग उड़ गए हों। समय की मार से चेहरे पर झुर्रियाँ, मंद दृष्टि, बिना दांत के मुख में होंठ अन्दर धंसे हुए, वृदावस्था से टूटा हुआ देह। केवल पुरानी पतली सफेद धोती लपेटे, एक घुटना सीने से लगाए। दुसरे घुटने पर कांपते हाथ का सहारा लिए, पत्थर के ठन्डे फर्श पर, पिचकी हुई थाली और इधर-उधर लुढ़कता हुआ लोटा रखे, कुठरिया के दरवाज़े पर बैठी हों।  घंटो सीढ़ियों पर थकी हुई कमजोर आँखें और कान लगाए, परछाइयों का पीछा करते बैठी रहतीं। 

जो भी, जब बी निकलता, उससे उम्मीद की रुकगा, कुछ कहेगा, कुछ सुनेगा। अकेली खुद से बड़-बड़ाती रहतीं। हम लोग जब भी निकलते, पास बुला कर पूँछती कौन हो, किसके मोड़ा हो। प्यार से पूरे चेहरे पर हाथ फेरती और गोदी में बैठा लेती। उनकी बस ये ही छवि अंकित है और ऐसे अंकित है जैसे कल की ही बात हो।

बऊ, मेरी पर-दादी, का निधन जब मेरी आयु ४-५ वर्ष की होगी तब हो गया था। जब भी उनकी बात होती है, उनका चेहरा, उनके कपड़े, उनका कमरा साक्षात् सामने उभर कर आ जाता है। उनकी कुठरिया का एक तरफ का  दरवाज़ा जीने के नीचे खुलता, दूसरी तरफ शौचालय और स्नानघर की तरफ। एक बड़ी खिड़की आँगन में खुलती, खिड़की से सीधे मंदिर में रखी मूर्तियों के दर्शन होते। कुठरिया के ऊपर रसोई में पूरे दिन चहल-पहल। कोई कहीं भी जाए और कहीं से भी आए, उनकी कमजोर ही सही, नज़र से नहीं बच सकता। 

आज भी वह दृश्य याद है, जब उनकी अर्थी घर के आँगन में सजी थी और उठी थी। उनका बहुत मान सम्मान और रुतबा किसी जमाने में रहा होगा, तभी अंतिम यात्रा के लिए बहुत भीड़ थी। आजतक भी जब उन सीढ़ियों से उतरता हूँ ऐसा लगता है बऊ वहीं पर, अभी तक बैठी हों, किसी का इंतज़ार कर रहीं हो।  

बाई अपने बुढ़ापे में, कई बार बऊ की कुठरिया के सामने बैठ कर अकेले बातें करती। जैसे वो बऊ से कुछ बातें कर रहीं हो। कई बार काफी देर तक बतियातीं और जैसे ही कोई टोकता, मानो नींद से जाग गयीं हो। 

एक बार बब्बा खाना खा रहे थे, और मैं उनके सामने बैठा था। बाई की बहुत देर तक आवाज़ नहीं आयी तो बब्बा ने बोला देख कर आओ। मैं जैसे ही कमरे से बहार निकला तो देखता हूँ कि बाई, सीढ़ियों के नीचे बैठी, कुठरिया के दरवाज़े की तरफ मुख कर कुछ फुसफुसा रहीं हैं। कोई गुप्त बात चल रही हो, ऐसा प्रतीत हुआ। जैसे ही मैंने बाई को बुलाया, वो ही हुआ, बाई नींद से उठ गई। थोड़ी तिलमिला और घबरा गयीं।  

"फिर बड़-बड़ान लगीं" - बब्बा बोले। 

रात को रोज़ की तरह मैं बब्बा के पास बैठा था। बब्बा अखबार पढ़ रहे थे, मेरे पास कुछ पन्ने थे। बब्बा बोले - "देखो बाई किते हैं?"

मैंने कमरे में झाँका, बाई सो चुकी थीं - "बाई सो रही हैं।"

बब्बा बोले - "इधर बैठो, थोड़े पैर दबा दो।"

बब्बा लेट गए, मैंने धीरे-धीरे पैर दबाने लगा। बब्बा धीमे स्वर में बोले - "कभी माता-पिता को परेशान मत करना, ये नतीजा होता है। बऊ के जीवनकाल में हमने और बाई ने बहुत पीड़ा दी"

१०-१५ मिनट तक बिल्कुल शांति। बब्बा सो गए, मैं भी थोड़ी देर के बाद चला गया. 

बाई-बब्बा के जाने बाद समय-समय पर बाई का बऊ के प्रति व्यवहार के बारे में कई लोगों से सुना। बाई ने उन्हें बहुत कष्ट दिया।  कभी किसी और का छोड़ा हुआ खाना परोसा, वो भी पिचके पुराने बर्तनो में। फटे पुराने कपड़ों देकर कुठरिया में डाल दिया था। 

एक बार चाचा ने अपनी ही माँ के बारे में कहा - "हमारी बाई बहुत ही कपटी औरत थीं।" 

सुनकर लगा थोड़ा सच तो होगा शायद। फ़िल्मी लगता है, विश्वास नहीं होता। बब्बा का जो कुछ भी था, उसकी असली मालिक तो बऊ थीं। सारा धन, सारी जायदाद, सब कुछ जिसका उसका ऐसा हश्र। 

बब्बा बऊ के दत्तक पुत्र थी। सबसे बड़े थे, सभी सौतेले भाई बहुत छोटे थे, तो पिता जी का सब कुछ और सारी ज़िम्मीदारी के साथ बब्बा को ही मिला। बऊ और बब्बा की शायद इसी वजह से खींचा-तानी थी कि उनके पति ने सब कुछ बब्बा को सौंप दिया था। बब्बा ने बऊ और अपने पिता की बात सुन ली थी, जिसमे बऊ ने चिंता व्यक्त की थी कि बब्बा ने यदि भाइयों का पालन नहीं किया को क्या होगा? बब्बा ने इस बात को दिल पर ले लिया था। बस क्या था, बब्बा बिना सवाल पूँछे भाइयों की सारी जरूरतें पूरी करते रहे। 

किसी विवाद के कारण, व्यापार नष्ट हो गया था। और बब्बा ने उसके बाद कुछ किया नहीं, यहाँ तक घर की देहरी भी उतरना बंद कर दिया। शादी-विवाह, शोक-सम्मान, चौक-तीज, त्यौहार-उत्सव कभी भी देहरी नहीं उतरे।  अपने पूरे जीवन में बब्बा को मैंने केवल दो बार देहरी उतारते देखा था। दोनों बार मैं की कारण था। 

एक बार जब मैंने डाक-टिकेटें निकलकर लिफाफे छत से सड़क पर फेक दिए थे और अगली सुबह जब बब्बा ने देखा तो सड़क से उठाए। शाम को मेरी बेंत से जोरदार पिटाई हुई। बेंत की एक मार से पेंट में पेशाब छूट गई थी।  दूसरी बार, में सुबह-सुबह साइकिल चलना सीख रहा था।  पता नहीं कैसे और क्यों, बब्बा ने साइकिल मुझ से ली और कहीं निकल गए।  आधे-पौने घंटे तक नहीं आये तो घर में हंगामा मच गया।  वापस आये तो पता चला, छोटे फुहारे के पास के मंदिर तक साइकिल ले गए थे। कई दिनों तक चर्चा का विषय बना रहा।  

अपने परिवार, सारे भाइयों और उनके परिवारों की सभी पूर्ति, पुस्तैनी जायदाद और दौलत बेच-बेच कर पूरा किया। दुकाने, गोदाम, मकान एक-एक करके सब बिकता रहा। जब भी किसी की शादी या विवाह होता कोई न कोई संपत्ति बिक जाती। राज मर्रा के खर्चों के लिए घर के गहने-जेवरात बिकते गए, सामन बिकता रहा। 

बब्बा के अंतिम समय तक उनके पास बेचने के कुछ नहीं था। एक बड़ा घर था जिनमे परिवार के सदस्य और कुछ सालों पुराने क्रियादार रहते। उनके निधन के बाद से ही उसके बिकने की प्रक्रिया शुरू हो गयी थी। पहले आधा बिका और अब २५ साल के बाद आखिरी भी बिक गया। जहाँ मेरा और मेरे पिताजी का जन्म हुआ, आज उस घर का सौदा निबट गया और हमारे खानदान का नाम मोहल्ले से मिट गया. चैत्र नवरात्री के प्रथम दिन एक अध्याय का अंत और नया प्रारम्भ। 

बब्बा की निशानी, आखिरी घर, तीन मंज़िला था। ६ जीने, १०-१२ कमरे, बच्चों के लिए भूल-भुलैया। हम बच्चे, एक से दौड़ते-भागते चढ़ते तो दूसरी तरफ किसी और जीने से उतरते। जब चार शैतान मिल जाते, जीनो पर उत्त्पात मच जाता। बड़ी बुआ और चाचा अक्सर डारते - "जीनन पर उधम न मचाओ, बऊ को भूत उतई बैठो है।" शायद इसी बात ने दिमाग में घर कर लिया है। 

घर की हालत बिकने से पहले जर-जर हो चुकी थी, चूंती टपकती छत और दीवार ने थक कर दम तोड़ ही दिया था।  पिछली बरसात में, जिस दिन घर बेचने पर सहमति हुई थी, एक तरफ के दीवार ढह गयी थी - "बऊ को भूत भीत गिराकर भाग निकलो गओ।"


१९-मार्च-२०२६ 

आशुतोष झुड़ेले
Ashutosh Jhureley
@OReKabira

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 "यह एक काल्पनिक कहानी है। किसी भी जीवित या मृत व्यक्ति से समानता मात्र एक संयोग है।"

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