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Hindi Poem - Those Coins, Those Old Coins - वो सिक्के, वो पुराने सिक्के - Re Kabira 118

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वो सिक्के, वो पुराने सिक्के !!! चाँदी, तांबे, कांसे के, थे कुछ पीतल के,  छोटे-बड़े, गोल-चौकोर, थे कुछ छिदे सिक्के, पुराने हैं, बाजार में जो बिकेंगे वजनों से, खोटे नहीं, महत्व है जो जोड़ो भावनाओं से, अहमियत नहीं उनकी खरीदने की क्षमता की,  तुम नहीं जान सकोगे कीमत दो-चार आने की, इसलिए पूँछ रहा हूँ, कहाँ हैं मेरे हिस्से के वो सिक्के, वो पुराने सिक्के? एक तरफ है सच, दूसरी तरफ झूठ, है विश्वास, पलटे धोखा है धूर्त,  है मान तो अपमान भी होगा,  है नदिया की धारा  तो तट भी होगा, जो उछालो तो नहीं केवल चित या पट तेरे हिस्से, नियत तय करती नियति, हैं कितनो के किस्से, इसलिए सोचता हूँ, क्यों चुरा लिए मेरे हिस्से के वो सिक्के, वो पुराने सिक्के? छीन लोगे, चुरा लोगे, छुपा लोगे मेरे हिस्से के वो सिक्के, वो पुराने सिक्के !!! क्या करोगे उसका जो सीख दे गए मेरे हिस्से के वो सिक्के, वो पुराने सिक्के? https://www.rekabira.in/2026/02/hindi-stories-those-coins-re-kabira-117.html आशुतोष झुड़ेले Ashutosh Jhureley @OReKabira -- o Re Kabira 117 o --

कुछ किस्से कहानियाँ - वो सिक्के - Hindi Stories - Those Coins - Re Kabira 117

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वो सिक्के "सुबह रेडियो बंद हो गओ, सेल लेते आना और बदल देना" - मैं चाचा की साइकिल निकालकर भंवरताल अपने दोस्त के घर जा रहा था तो बब्बा ने याद दिलाया। दोस्तों के साथ डेढ़-दो घंटे घूमने-फिरने के बाद घर आते समय, तिगड्डे पर किराना दूकान से दो सेल और पार्ले बिस्कुट का पैकेट खरीद लिया। चाचा लोग चाय पी रहे थे, उनके साथ चाय बिस्कुट मैं भी खाने लगा ही था कि बब्बा ने सेल लेकर नीचे बुलाया। ज्यों हमने रेडियो के सेल बदले त्यों आकाशवाणी पर समाचार शुरू हो गए।  खाना खाने के बाद बब्बा और मैं अक्सर बतियाते थे, जो भी विषय सामने आजाये उस पर बातें शुरू हो जाती। जैसे कल हमने धनुषधारी मंदिर के बारे में बात शुरू की, फिर बब्बा ने रामायण खोल एक अध्याय पढ़ा। पहले मुझे पढ़ने दिया, ढंग से नहीं पढ़ा तो ख़ुद ही पढ़ कर बताया। उससे पहले मैंने टेबल टेनिस के बारे में उन्हें बताया, कैसे खेलते हैं, नियम, मैं कहाँ सीखने जाता, कौन सिखाता वगैरह। कभी वो अपने किससे सुनाते, कभी मेरी सुनते। कुछ नहीं मिलता तो अखबार तो था ही, नहीं तो बब्बा के कुछ देर पैर खोंद कर सोने चला जाता। उस दिन थोड़ी देर पहले जो रेडियो से पुराने सेल न...

कुछ किस्से कहानियाँ - बेंदी - Hindi Stories - Bendi - Re Kabira 116

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-- o Re Kabira 116 o -- बेंदी बब्बा के फूल अभी चुने नहीं थे, पर उनकी तिजोरी उनके सभी बेटों ने खोल दी। पता नहीं बब्बा ने सबसे छुपा कर या बचा कर उसमें क्या खजाना दबा रखा हो? वह तिजोरी नहीं, बब्बा की ढकी हुई प्रतिष्ठा थी—और जो निकला, वह उनकी वास्तविकता थी। एक, दो और पाँच रुपये के नए नोटों की एक-आधी गड्डियाँ, जो पापा बब्बा को त्योहार और व्यवहार के लिए दे आते थे, और थोड़ी चिल्लड़ । तिजोरी में कुछ चाँदी और पीतल के खिलौने और टूटे हुए जेवर भी थे। जेवर और खिलौने कबाड़ी के भाव बेच दिए गए, नोटों की गड्डियों को ताऊजी ने सभी भाइयों में बराबर बाँट दिया और चिल्लड़ बाई को दे दी।   बाई ने बड़बड़ाते और आँसू बहाते हुए वापस उनकी तरफ झटकार दी—“दो दिन भय नोइ, तुम औरन ने जो सुरु कर दौ।” मुझे बब्बा और बाई—यानि दादा और दादी—के साथ 10वीं, 11वीं, 12वीं के बाद और नौकरी ज्वाइन करने से पहले हर बार 2–3 महीने अकेले बिताने मिले। बाई तो बस लड़याती थीं, पर बब्बा के साथ रोज़ कई घंटे बातें होती थीं। हालाँकि भैया उनके सबसे प्रिय थे, मेरा उनसे अलग प्रेम था। सभी नाती‑पोतों में केवल मैं था जो उनसे पीटा था—वह ...

Hindi Poem - Aditi is 16 - १६ की अदिति - Re Kabira 115

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-- o Re Kabira 115 o -- १६ की अदिति क्यों इतनी जल्दी बड़ी होती जा रही हो?   क्यों इतने झटके देती जा रही हो? क्यों हर साल और महँगी होती जा रही हो?   मम्मी बोलती—“थोड़ा धीरे‑धीरे बड़े हो।”   पापा कहते—“मुझे तैयार तो होने दो।” छोटी थी तो दादू कहते—“जादू की पुड़िया हो।”   थोड़ी बड़ी हुई तो दादी कहती—“मेरी बातूनी गुड़िया हो।”   और अब नानी कहती—“कितनी लड़ैया हो!”   मम्मी से बराबर लड़ लेती हो,   पापा से कहती—“आप तो रहने ही दो।” जो चाहती हो, किसी न किसी बहाने करवा लेती हो,   रोकर, लड़कर, कभी छीनकर बातें मनवा लेती हो।   घूस, कभी धमकी देकर आदित को साथ मिला लेती हो।   मम्मी तुम्हारे परपंच पकड़ लेती है,   पापा को लड़या कर कोई भी काम करवा लेती हो। पहले ज़िद करती थी—गोदी में लिए रहो,   अब कमरे से बाहर भगा देती हो।   “I am 16!” कहकर अकड़ दिखा देती हो।   मम्मी से थोड़ा डरती पापा को “नो पपा, नो!” कहकर चुप करा देती हो।   “I am like you” बोलकर पापा को ही...

Hindi Poetry - I know you - हिंदी कविता - मैं तुम्हें पहचानता हूँ - Re Kabira 114

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-- o Re Kabira 114 o --  मैं तुम्हें पहचानता हूँ आज सुबह चाय पीते समय किसी ने दस्तक दी, न नमस्ते, न राम‑राम—सीधे बोला, “मैं तुमसे बहुत नाराज़ हूँ।” उसका चेहरा गुस्से में लाल, तेज़ गहरी साँसें समझ से परे थीं।   मैंने कहा, “तुम कौन हो भई? मैं तो तुम्हें जानता ही नहीं।” वह बड़े अचरज से बोला, “ये कैसे हो सकता है कि तुम मुझे जानते नहीं?   मैं तुम्हें तुम्हारे बचपन से जानता हूँ।   तुम्हारे इतने सारे इल्ज़ाम हैं मुझ पर—तुम्हे कुछ याद नहीं?” अच्छी ज़बरदस्ती है, बड़ी मुसीबत है, न जान, न पहचान, चले आते हैं।   मैंने चिड़चिड़ाते हुए कहा, “चलो बताओ,  किसने, कब,  कहाँ,   कौनसा  इल्ज़ाम लगाया?” एक क्षण का सन्नाटा,  फिर बोला, “कब, कहाँ से शुरु करुँ ... चलो बचपन से याद दिलाता हूँ।” तुम जबरदस्ती मोहल्ले की क्रिकेट टीम के कप्तान बन जाते,   और जब भी हार होने वाली होती, लड़ाई‑झगड़े शुरू कर,   बेईमानी कर खेल बीच में छोड़कर भाग जाते थे । दो‑तीन बार हार के बाद बल्ले दूर फेंक तोड़े  थे  तुमने, हार स्वीकारने क...

कुछ किस्से कहानियाँ - आत्मायें - Hindi Stories - Re Kabira 112

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-- o Re Kabira 112 o --  आत्मायें  नशेड़ी — ये नाम छपा हुआ था मेरे हॉस्टल के कमरे के बाहर। और क्यों न हो—जैसे ही कोई भी टूटे हुए दरवाज़े से अंदर आता, उसका स्वागत सिगरेट के धुएँ, आधे जले हुए ठूँठों और बियर या रम की खाली बोतलों से होता। घर से जो खर्चे और नाश्ते‑खाने के पैसे मिलते थे, वो शुरू के 15 दिनों में ही खत्म हो जाते। उसके बाद दोस्त और सीनियर्स का सहारा, और फिर उधारी। पर मामला ऐसा शुरू से नहीं था। शौक‑शौक में एक सिगरेट का कश कब लत बन गया और पार्टी की बियर कब खाने का विकल्प बन गई—पता ही नहीं चला। हालत ये हो गई थी कि कॉलेज में हर क्लास से पहले 1–2 सिगरेट के बिना बैठा नहीं जाता था। पूरे दिन में 2–3 पैकेट, यानी 20–30 सिगरेटें धुएँ के साथ हवा हो जातीं। और हर दूसरे दिन बियर, रम, व्हिस्की—देसी या विदेशी—कुछ न कुछ हॉस्टल के किसी कोने में मिल ही जाती थी। कभी क्लास टाइम पर पहुँच ही नहीं पाता था, और पहुँच गया तो आँखें खुली रखना मुश्किल होता। और अगर नींद खुल जाए तो क्लास से बाहर निकाल दिया जाता। इंजीनियरिंग की पढ़ाई के शुरुआती कुछ महीने रैगिंग, मस्ती और दोस्ती‑यारी में निकल जाते हैं।...

कुछ किस्से कहानियाँ - करिया - Hindi Stories - Re Kabira 113

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-- o Re Kabira 113 o --  करिया जबलपुर के एक वन्य अभ्यारण्य में मेरी मुलाक़ात करिया चौकीदार से हुई। उम्र साठ के पार, चेहरे पर संघर्ष की रेखाएँ और आँखों में जीवन की अनकही कहानियाँ। चार हफ़्तों तक कई सुबह वह मिलता रहा—धीरे‑धीरे पहचान बनी, और फिर इधर‑उधर की बातें भी होने लगीं। मैं वहाँ प्रवासी पक्षियों की तस्वीरें लेने जाता था। कैमरा और इस शौक को देखकर वह बार‑बार पूछता—“इससे होता क्या है? पैसे मिलते होंगे? सरकारी नौकरी है या प्राइवेट? दो‑चार लाख का कैमरा होगा?” उसके सवालों में जिज्ञासा भी थी और जीवन के व्यावहारिक अनुभवों की झलक भी। जवाब देते‑देते हम दोनों के बीच एक सहज आत्मीयता जन्म ले चुकी थी। करिया का जन्म 1964 या 65 में राखी के आस‑पास कुररी गाँव में हुआ था। वह उनके कुल में 20 साल बाद, 14 लड़कियों के बाद पहला लड़का था—माता‑पिता की पाँचवीं संतान। बहुत ख़ुशी और हर्ष से गाँव में छोटी‑सी दावत भी की गई थी। रंग काला था, तो बस तब से ही नाम करिया पड़ गया, हालाँकि घर के सभी लोगों का रंग उनसे भी गहरा था। उस साल कुररी और पास के इलाक़ों में बहुत बारिश हुई। भयंकर बाढ़ आई और पूरे क्षेत्र की खड़ी फ...