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Hindi Poem - We Come To Meet You - हम मिलने आते हैं - Re Kabira 119

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हम मिलने आते हैं चलो सैर कर आते हैं, थोड़ी बातें कर आते हैं, कई दिन हो गए निकले, थोड़ा टहल आते हैं... अरसे से व्यस्त हैं, कुछ पल बिता साथ आते हैं, मौसम का मिज़ाज अच्छा है, उठाकर लुत्फ़ आते हैं... बेचैनी-सी मन में है, खुली हवा में साँस ले आते हैं, थोड़ी बहुत ही सही, बटोर ताज़गी घर ले आते हैं... रोज़ की जद्दोजहद छोड़, खोज सुकून आते हैं, मौक़ा मिला है तो बाग़ीचे में सेक धूप आते हैं... शोर-शराबे से बच, कोयल की कूक सुन आते हैं, भीड़-भड़ाके से दूर, घूम एकांत गली में आते हैं... रात के अँधेरे में टूटते सितारों को सुना चाहतें आते हैं, और अगर, गुम गए तो लपेट जुगनुओं की तिमतिमाहट ले आते हैं... बहा मन की चिड़चिड़ाहट नदिया में आते हैं, कोलाहल से छुप, सुन झरनों के गीत आते हैं... यूँ ही भटक रहे हैं, देखो अब लौट घर आते हैं, गुम गया जो बचपना, उससे फिर मिल आते हैं... अट्टू गुदा होगा आँगन में, ढूँढ चिएँ खेल आते हैं, पतंगों की महफ़िल में हम भी पेंच लड़ा आते हैं... पापा के साथ मंडी से चुन सब्जियाँ ले आते हैं, मम्मी के खाने की खुशबू आई - साथ बैठ खा आते हैं... बिखरी हुई यादों को हार में पिरो, समेट लाते हैं, ...

Hindi Poem - Those Coins, Those Old Coins - वो सिक्के, वो पुराने सिक्के - Re Kabira 118

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वो सिक्के, वो पुराने सिक्के !!! चाँदी, तांबे, कांसे के, थे कुछ पीतल के,  छोटे-बड़े, गोल-चौकोर, थे कुछ छिदे सिक्के, पुराने हैं, बाजार में जो बिकेंगे वजनों से, खोटे नहीं, महत्व है जो जोड़ो भावनाओं से, अहमियत नहीं उनकी खरीदने की क्षमता की,  तुम नहीं जान सकोगे कीमत दो-चार आने की, इसलिए पूँछ रहा हूँ, कहाँ हैं मेरे हिस्से के वो सिक्के, वो पुराने सिक्के? एक तरफ है सच, दूसरी तरफ झूठ, है विश्वास, पलटे धोखा है धूर्त,  सीधा गिरे तो मान उल्टा पड़े अपमान होगा,  है नदिया की धारा  तो तट भी होगा, जो उछालो तो नहीं केवल चित या पट तेरे हिस्से, नियत तय करती नियति, हैं कितनो के किस्से, इसलिए सोचता हूँ, क्यों चुरा लिए मेरे हिस्से के वो सिक्के, वो पुराने सिक्के? छीन लोगे, चुरा लोगे, छुपा लोगे मेरे हिस्से के वो सिक्के, वो पुराने सिक्के !!! क्या करोगे उसका जो सीख दे गए मेरे हिस्से के वो सिक्के, वो पुराने सिक्के? https://www.rekabira.in/2026/02/hindi-stories-those-coins-re-kabira-117.html आशुतोष झुड़ेले Ashutosh Jhureley @OReKabira -- o Re Kabira 117 o --

बार-बार जन्म लेता रहा तू - Hindi Poetry - Re Kabira 111

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-- o Re Kabira 111 o --  बार-बार जन्म लेता रहा तू  खूब धूम मची, 2 दशक - 14 लड़कियों के बाद कुल में लड़का जन्मा तू,   रंग काला, बोलना सीखा नहीं—करिया कहलाया तू। फसल बह गई, घर बिक गया जिस बरस आया तू, अभी चलना सीखा नहीं, गोद में ही पुरे बचपन कोसा गया तू।   मिट्टी ही तेरे खेल खिलौने, उसी में हँसता तू,   दूर से ही पटाखे सुन दिवाली पर खुश होता तू।   फटी किताबों के चित्रों में ही खोया रहा तू,  (उनमे ही अपने ख़्वाब बनाये तूने) नंगे पाँव मीलों स्कूल तक दौड़ता रहा तू।   समझ न सका क्यों कक्षा के बाहर बैठाया गया तू,   कई बार बिना वजह चोर कहलाया तू।  कितने घरों की देहरी पार न कर पाया तू,   मंदिर के बाहर ही मन्नतों के धागे बाँध आया तू।   नमक पानी आधी रोटी, कितनी बार भूखा रोया, सोया तू,  कभी तानों से, कभी गालियों से बौखलाया तू।   लातें सहकर चुप अपने ही घर छुप गया तू,   हर रात सवालों के साथ अँधेरे में रोया तू। हर बार लगा क्यों सब से इतना अलग है तू,  परीक्षा के फॉर्म कुरेदते रहे...

अगर प्रकृति में भेदभाव होता - If Nature Discriminated - Hindi Poetry - Re Kabira 110

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-- o Re Kabira 110 o -- अगर प्रकृति में भेदभाव होता अगर प्रकृति में भेदभाव होता... अगर बादलों का मज़हब होता तो पानी की बूँदे नहीं - तेज़ाब बरसता पहाड़ों पर बर्फ नहीं राख का ढेर होता  विषैला पानी, नदियों मे बहता लहू और  पर्वत काले - समंदर केवल लाल रंग का होता ! अगर प्रकृति में भेदभाव होता... अगर हवा गोरी या काली होती तो साँसों में ज़िन्दगी नहीं - मौत बहती ख़ुश्बू और बदबू में कोई फ़र्क न होता  परिंदे नहीं उड़ते, आसमान वीरान और  धरती काली - आकाश केवल लाल रंग का होता ! अगर प्रकृति में भेदभाव होता... अगर पेड़-पौधों की जात होती  तो फल धतूरे - फूल सारे कनेर के होते  ज़ुबान पर बस कड़वे तीखे स्वाद होते  पानी नहीं खून से सींचते, तनों पर कांटे और  जडें ज़हरीली - हर पत्ता केवल सुर्ख लाल रंग का होता ! अगर प्रकृति में भेदभाव होता, तो क्या होता? आशुतोष झुड़ेले Ashutosh Jhureley @OReKabira -- o Re Kabira 110 o --