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Hindi Poem - Aditi is 16 - १६ की अदिति - Re Kabira 115

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-- o Re Kabira 115 o -- १६ की अदिति क्यों इतनी जल्दी बड़ी होती जा रही हो?   क्यों इतने झटके देती जा रही हो? क्यों हर साल और महँगी होती जा रही हो?   मम्मी बोलती—“थोड़ा धीरे‑धीरे बड़े हो।”   पापा कहते—“मुझे तैयार तो होने दो।” छोटी थी तो दादू कहते—“जादू की पुड़िया हो।”   थोड़ी बड़ी हुई तो दादी कहती—“मेरी बातूनी गुड़िया हो।”   और अब नानी कहती—“कितनी लड़ैया हो!”   मम्मी से बराबर लड़ लेती हो,   पापा से कहती—“आप तो रहने ही दो।” जो चाहती हो, किसी न किसी बहाने करवा लेती हो,   रोकर, लड़कर, कभी छीनकर बातें मनवा लेती हो।   घूस, कभी धमकी देकर आदित को साथ मिला लेती हो।   मम्मी तुम्हारे परपंच पकड़ लेती है,   पापा को लड़या कर कोई भी काम करवा लेती हो। पहले ज़िद करती थी—गोदी में लिए रहो,   अब कमरे से बाहर भगा देती हो।   “I am 16!” कहकर अकड़ दिखा देती हो।   मम्मी से थोड़ा डरती पापा को “नो पपा, नो!” कहकर चुप करा देती हो।   “I am like you” बोलकर पापा को ही...

बार-बार जन्म लेता रहा तू - Hindi Poetry - Re Kabira 111

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-- o Re Kabira 111 o --  बार-बार जन्म लेता रहा तू  खूब धूम मची, 2 दशक - 14 लड़कियों के बाद कुल में लड़का जन्मा तू,   रंग काला, बोलना सीखा नहीं—करिया कहलाया तू। फसल बह गई, घर बिक गया जिस बरस आया तू, अभी चलना सीखा नहीं, गोद में ही पुरे बचपन कोसा गया तू।   मिट्टी ही तेरे खेल खिलौने, उसी में हँसता तू,   दूर से ही पटाखे सुन दिवाली पर खुश होता तू।   फटी किताबों के चित्रों में ही खोया रहा तू,  (उनमे ही अपने ख़्वाब बनाये तूने) नंगे पाँव मीलों स्कूल तक दौड़ता रहा तू।   समझ न सका क्यों कक्षा के बाहर बैठाया गया तू,   कई बार बिना वजह चोर कहलाया तू।  कितने घरों की देहरी पार न कर पाया तू,   मंदिर के बाहर ही मन्नतों के धागे बाँध आया तू।   नमक पानी आधी रोटी, कितनी बार भूखा रोया, सोया तू,  कभी तानों से, कभी गालियों से बौखलाया तू।   लातें सहकर चुप अपने ही घर छुप गया तू,   हर रात सवालों के साथ अँधेरे में रोया तू। हर बार लगा क्यों सब से इतना अलग है तू,  परीक्षा के फॉर्म कुरेदते रहे...

अनुगच्छतु प्रवाहं - Go With The Flow - Hindi Poetry - Re Kabira 109

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-- o Re Kabira 109 o -- अनुगच्छतु प्रवाहं टिक-टिक-टिक घड़ी की टिक-टिकी एक प्रवाह छुक-छुक-छुक रेल का रेला,  धक-धक-धक दिल  की   धड़कन और  डम-डम-डम डमरू की डमक भी प्रवाह  प्रवाह  कविता है और महा काव्य भी कहानी है, कथा  है , लेख है और ग्रंथ भी  प्रवाह प्रवाह प्रकृति है और पुरुष भी छाया है काया है साया है और माया भी प्रवाह जल प्रवाह से नदियाँ, झरने और सागर भी आकाश फटे सैलाब बरपे प्रलय का विध्वंसक प्रवाह वायु प्रवाह से श्वास भी आँधी-तूफ़ान भी क्षण में मौसम बदल जाए जब हो हवा का तीव्र प्रवाह सूरज की किरणों के प्रवाह से भोर भी साँझ भी पहर दर पहर दिन रात चलता समय का अविरल प्रवाह प्रकृति के रंगो के प्रवाह से बसंत भी बहार भी ऋतू बदनले का सन्देश लाये भौरों की गुंजन, पँछियों का संगीत प्रवाह मौसम में बदलाव का प्रवाह हो सूखे पत्तों से भी नम माटी से भी बादल गरजें, जोर से बरसे तब झूमे किसान तो हर्ष प्रवाह रंगो के प्रवाह से चित्र भी कलाकृति भी कला से व्यक्त करे कलाकार अनुभूति का प्रवाह विद्या प्रवाह से एकलव्य भी अर्जुन भी बने महान योद्धा जब मिला उन्हें गुरु ज्ञान प्र...