बार-बार जन्म लेता रहा तू - Hindi Poetry - Re Kabira 111

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जबलपुर के एक वन्य अभ्यारण में मेरी मुलाक़ात करिया चौकीदार से हुई। उम्र साठ के पार, चेहरे पर संघर्ष की रेखाएँ और आँखों में जीवन की अनकही कहानियाँ। चार हफ़्तों तक कई सुबह वह मिलता रहा—धीरे‑धीरे पहचान बनी, और फिर इधर‑उधर की बातें भी होने लगीं।

मैं वहाँ प्रवासी पक्षियों की तस्वीरें लेने जाता था। कैमरे और इस शौक को देखकर वह बार‑बार पूछता—“इससे होता क्या है? पैसे मिलते होंगे? सरकारी नौकरी है या प्राइवेट? दो‑चार लाख का कैमरा होगा?” उसके सवालों में जिज्ञासा भी थी और जीवन के व्यावहारिक अनुभवों की झलक भी। जवाब देते‑देते हम दोनों के बीच एक सहज आत्मीयता जन्म ले चुकी थी।

उसे आश्चर्य होता कि मैं उसे चौकीदार साहब और आप कहकर सम्बोधित करता हूँ, कभी चाय‑पानी के लिए पूछ लेता हूँ। शायद यह सम्मान उसके लिए असामान्य था। वह बड़े शौक से अपने गाँव, बचपन और बच्चों की बातें सुनाता। कुररी गाँव से तीस साल पहले शहर आया था। कई बार लौटा, पर रोज़गार की तलाश उसे फिर जबलपुर खींच लाती। पत्नी के निधन के बाद पिछले पाँच वर्षों से चौकीदारी कर रहा है। छोटी‑सी छप्पर में उसका जीवन चलता है।

पत्नी COVID‑19 संक्रमण में चल बसी। करिया चौकीदार ने भारी दुःख से कहा—“केबल COVID ने भेद‑भाव नई करो।” इस वाक्य में उसकी पीड़ा और स्वीकार्यता दोनों समाई थीं। दो बेटे और एक बेटी गाँव में छोटे‑मोटे काम करके अपने परिवार पाल रहे हैं। दो वर्षों से कोई उससे मिलने नहीं आया, केवल फोन पर खेती की बातें हो जाती हैं। उसके जीवन के छोटे‑बड़े संघर्षों ने मुझे गहराई से छुआ। उसके छोटे-बड़े संघर्षों को संजोति ये कविता। 

खूब धूम मची, दो दशक बाद लड़का जन्मा तू,  
फसल बह गई, घर बिक गया जिस बरस आया तू।  
अभी चलना सीखा नहीं, गोद में ही कोसा गया तू,  
रंग काला, बोलना सीखा नहीं—करिया कहलाया तू।  

मिट्टी ही तेरे खेल‑खिलौने, उसी में हँसता तू,  
दूर से ही पटाखे सुन दिवाली पर खुश होता तू।  
हर बार लगा क्यों सब से इतना अलग है तू,  
किसी न किसी बहाने बार‑बार जन्म लेता रहा तू।  

फटी किताबों के चित्रों में ही खोया रहा तू,  
नंगे पाँव मीलों स्कूल तक दौड़ता रहा तू।  
समझ न सका क्यों कक्षा के बाहर बैठाया गया तू,  
कई बार बिना वजह चोर कहलाया तू। 

कितने घरों की देहरी पार न कर पाया तू,  
मंदिर के बाहर ही मन्नतों के धागे बाँध आया तू।  
नमक‑पानी आधी रोटी, कितनी बार भूखा सोया तू,  
किसी न किसी बहाने बार‑बार जन्म लेता रहा तू।  

कभी तानों से, कभी गालियों से बौखलाया तू,  
लातें सहकर चुप अपने ही घर छुप गया तू।  
हर रात सवालों के साथ अँधेरे में रोया तू,  
परीक्षा के फॉर्म कुरेदते रहे घाव—सामान्य नहीं तू।  

हॉस्टल में शौचालय के पास ही जगह बना पाया तू,  
जैसे‑तैसे लड़ते‑झगड़ते कॉलेज तक पढ़ आया तू।  
दिनों दिन औरों से ज्यादा खुद से लड़ता रहा तू,  
किसी न किसी बहाने बार‑बार जन्म लेता रहा तू।  

नौकरी की कतार में पीछे था, पर डटा रहा तू,  
बहुत तिरस्कार सहा, लौटने को मजबूर हुआ तू।  
शादी के बाद मुश्किल से पक्की छत बना पाया तू,  
बच्चों में अपने संघर्ष की छाया देख घबराता तू।  

कैसे समझाऊँ क्यों रातों को विचलित रहता तू,  
कैसे बताऊँ क्यों औरों से छोटा प्रतीत होता तू।  
कैसे सिखाऊँ कि लड़ना ही जीवन है जैसे लड़ा तू,  
किसी न किसी बहाने बार‑बार जन्म लेता रहा तू।  

कोई राम‑राम बोल दे तो खुश हो जाता तू,  
उम्र बीत गई, "आप" कहलवा न पाया तू।  
बार‑बार खुद को ढूँढ़ता, टटोलता रहता तू,  
फिर जब भी मिलता, कोई और ही मिलता तू।  

रात भर जागता, दिन में कहीं गुम हो जाता तू,  
हर रोज़ नई पहचान मिलती, फिर भी खोया नहीं तू।  
नाम‑काम‑ज्ञान‑मान गिराता, फिर उठता तू,  
किसी न किसी बहाने बार‑बार जन्म लेता रहा तू।  



आशुतोष झुड़ेले
Ashutosh Jhureley
@OReKabira

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