बार-बार जन्म लेता रहा तू - Hindi Poetry - Re Kabira 111
-- o Re Kabira 111 o --
बार-बार जन्म लेता रहा तू
खूब धूम मची, 2 दशक - 14 लड़कियों के बाद कुल में लड़का जन्मा तू,
रंग काला, बोलना सीखा नहीं—करिया कहलाया तू।
फसल बह गई, घर बिक गया जिस बरस आया तू,
अभी चलना सीखा नहीं, गोद में ही पुरे बचपन कोसा गया तू।
मिट्टी ही तेरे खेल खिलौने, उसी में हँसता तू,
दूर से ही पटाखे सुन दिवाली पर खुश होता तू।
फटी किताबों के चित्रों में ही खोया रहा तू, (उनमे ही अपने ख़्वाब बनाये तूने)
नंगे पाँव मीलों स्कूल तक दौड़ता रहा तू।
समझ न सका क्यों कक्षा के बाहर बैठाया गया तू,
कई बार बिना वजह चोर कहलाया तू।
कितने घरों की देहरी पार न कर पाया तू,
मंदिर के बाहर ही मन्नतों के धागे बाँध आया तू।
नमक पानी आधी रोटी, कितनी बार भूखा रोया, सोया तू,
कभी तानों से, कभी गालियों से बौखलाया तू।
लातें सहकर चुप अपने ही घर छुप गया तू,
हर रात सवालों के साथ अँधेरे में रोया तू।
हर बार लगा क्यों सब से इतना अलग है तू,
परीक्षा के फॉर्म कुरेदते रहे घाव—सामान्य नहीं तू।
छात्रावास में शौचालय के पास ही जगह बना पाया तू,
जैसे तैसे लड़ते झगड़ते कॉलेज तक पढ़ आया तू।
नौकरी की कतार में पीछे था, पर डटा रहा तू,
दिनों दिन औरों से ज्यादा खुद से लड़ता रहा तू।
बहुत तिरस्कार सहा, बार-बार गांव लौटने को मजबूर हुआ तू,
बहुत मुश्किल से पक्की छत बना पाया तू।
बच्चों में अपने संघर्ष की छाया देख घबराता तू,
कैसे समझाओगे? क्यों रातों को विचलित रहता तू।
कैसे बताओगे? क्यों औरों से छोटा प्रतीत होता तू,
कैसे सिखाओगे? कि लड़ना ही जीवन है जैसे लड़ा तू।
कोई राम राम बोल दे तो खुश हो जाता तू,
रात भर जागता, दिन में कहीं गुम हो जाता तू।
हर रोज़ नई पहचान मिलती, फिर भी खोया नहीं तू,
नाम काम ज्ञान मान गिराता, फिर उठता तू।
राजा-महाराजा-जमींदार-रजवाड़े-बलवान-धनवान नहीं तू
जो एक बार जन्म लेते हैं और एकबार मरते हैं वो नहीं तू ,
गरीब-मजदूर-छोटे किसान-दिहाड़ी श्रमिक में एक तू,
जो रोज़ सुबह जन्म लेते हैं और रात को मर जाते हैं वो है तू
तू-तू-तू .. तू-तू-तू .. तू-तू-तू ..
तेरी उम्र बीत गई, "आप" कहलवा न पाया तू,
बार बार खुद को ढूँढ़ता रहता, टटोलता रहता तू,
फिर जब कभी मिलता, कोई और ही मिलता तू
किसी न किसी बहाने बार बार जन्म लेता रहा तू।
आशुतोष झुड़ेले
Ashutosh Jhureley
@OReKabira
-- o Re Kabira 111 o --
