कुछ किस्से कहानियाँ - आत्मायें - Hindi Stories - Re Kabira 112
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आत्मायें
नशेड़ी — ये नाम छपा हुआ था मेरे हॉस्टल के कमरे के बाहर। और क्यों न हो—जैसे ही कोई भी टूटे हुए दरवाज़े से अंदर आता, उसका स्वागत सिगरेट के धुएँ, आधे जले हुए ठूँठों और बियर या रम की खाली बोतलों से होता। घर से जो खर्चे और नाश्ते‑खाने के पैसे मिलते थे, वो शुरू के 15 दिनों में ही खत्म हो जाते। उसके बाद दोस्त और सीनियर्स का सहारा, और फिर उधारी।
पर मामला ऐसा शुरू से नहीं था। शौक‑शौक में एक सिगरेट का कश कब लत बन गया और पार्टी की बियर कब खाने का विकल्प बन गई—पता ही नहीं चला। हालत ये हो गई थी कि कॉलेज में हर क्लास से पहले 1–2 सिगरेट के बिना बैठा नहीं जाता था। पूरे दिन में 2–3 पैकेट, यानी 20–30 सिगरेटें धुएँ के साथ हवा हो जातीं। और हर दूसरे दिन बियर, रम, व्हिस्की—देसी या विदेशी—कुछ न कुछ हॉस्टल के किसी कोने में मिल ही जाती थी।
कभी क्लास टाइम पर पहुँच ही नहीं पाता था, और पहुँच गया तो आँखें खुली रखना मुश्किल होता। और अगर नींद खुल जाए तो क्लास से बाहर निकाल दिया जाता।
इंजीनियरिंग की पढ़ाई के शुरुआती कुछ महीने रैगिंग, मस्ती और दोस्ती‑यारी में निकल जाते हैं। बेवजह रात दो बजे ठंड में होली खेलना, रात भर गाना‑बजाना, चिल्लाना, सड़कों पर शोर‑शराबा, कमरों में एक‑दूसरे की टांग खींचना—हॉस्टल की शुरुआती ज़िंदगी बस ऐसी ही थी।
हमारी हॉस्टल की विंग में सबसे खुरापाती लोग थे, और हमने इसका नाम “जुरासिक” रख दिया था। कोई और इस विंग के कमरों में आता तो कंबल कुटाई, पिरामिड चढ़ाई—मतलब एक बेखबर, बेसुध लेटे हुए बंदे के ऊपर अचानक 8–10 लोग चढ़ जाते—और सबसे ज़्यादा चप्पल चोरी का खतरा सिर पर मंडराता। जी हाँ ! हॉस्टल में जान के बाद सबसे कीमती चीज़ चप्पलें ही होती थीं।
मेरी मस्ती, सिगरेट और शराब बस बढ़ती जा रही थीं। दोस्त तो थे ही उकसाने के लिए, तो फिर क्या था। पर मेरी शरारतें और मस्तियाँ बहुतों के लिए गुस्से और खीज का कारण भी बनती जा रही थीं। हॉस्टल में चोरियाँ कोई नई बात नहीं थीं, पर हमारे हॉस्टल में ये कुछ ज़्यादा ही होने लगी थीं। रोज़ किसी न किसी के बटुए से, तो किसी की पेटी से पैसे चोरी होने लगे।
एक दोपहर मैं अपने कमरे में क्लास से बंक मारकर सिगरेट के धुएँ में गुम था कि अचानक दस–बारह दोस्त यार घुस आए। गाली‑गलौच के साथ चोरियों का इलज़ाम मढ़ दिया गया। कमरे और सामान की तलाशी ली गई, और जब कुछ नहीं मिला तो लात‑घूँसों की बौछार। सभी ने अपनी भड़ास, किसी बात का गुस्सा और खीज मुझ पर निकाल ली। अच्छा मौक़ा था,कुछ ने बहती गंगा में हाथ दो लिए। नतीजा - कुछ नहीं मिला और मैंने कुछ नहीं बोला, तो थोड़ी देर में शांत होकर चले गए। सूजा हुआ चेहरा, शर्ट के टूटे बटन, फटी जीन्स और उन लोगों में मेरे सबसे अच्छे दोस्तों को देखकर मैं हैरान था। रैगिंग और परीक्षा के माहौल में सब फिर वैसे ही चलने लगा। चोरियाँ रुकी नहीं। हालाँकि, मुझे और कुछ और लोगों को पता था कि कौन चोरियाँ कर रहा होगा। जो जैसा था, वैसे ही चलता रहा।
एक साल निकल गया। हमारे जूनियर्स आए और जैसी हमारी रैगिंग हुई थी, हमने भी थोड़ी‑बहुत रैगिंग लेना शुरू किया। फर्स्ट ईयर से सेकंड ईयर के परिवर्तन में सब व्यस्त थे। फिर एक दिन कुछ ऐसा हुआ जिसने मुझे झकझोर कर रख दिया। मेरे कुछ सबसे अच्छे दोस्तों के ज़हन में चोर मैं ही था। एक मित्र के बटुए या शायद पेटी से पैसे चोरी हो गए थे और पता नहीं क्यों शक मुझ पर था। शायद इसलिए कि जब सब कॉलेज में होते थे, मैं नशे में धुत्त हॉस्टल के कमरे में पड़ा रहता था, या फिर इसलिए कि मैं अक्सर उधार माँगता रहता था। पता नहीं।
एक देर रात मैं अपने कमरे में सिगरेट में डूबा हुआ था कि दो कमरे दूर से एक मित्र आया और मुझे अपने साथ ले गया। उसके कमरे में अँधेरा था, केवल एक मोमबत्ती जल रही थी, पलंग पर ड्रॉइंग बोर्ड, उस पर प्लान‑चिट का चार्ट बना हुआ था और चारों तरफ़ बाँकी दोस्त बैठे हुए थे।
यदि आपको प्लान‑चिट नहीं पता है तो बता दूँ—ये कमज़ोर दिल वालों के लिए नहीं है। यह वह खेल है जिसमें भटकती आत्माओं की मदद से काम करवाए जाते हैं या फिर अनसुलझे सवालों के जवाब ढूँढे जाते हैं। चार्ट पर A‑Z अक्षर, 0‑9 तक अंक और ‘हाँ/न’ लिखा होता है। एक कटोरी को उल्टा करके उसके नीचे सिक्का डाल देते हैं। जो लोग खेल में हिस्सा लेते हैं, सब कटोरी पर एक उँगली रखते हैं और दूसरे हाथ से बाजू वाले का हाथ पकड़ लेते हैं। किसी को खेल बीच में छोड़ने की इजाज़त नहीं होती। यदि अधूरे खेल में उठ जाओ तो आत्मा वापस नहीं जाती। मानो या न मानो—कुछ लोग इसे रोमांचक खेल समझकर खेलते हैं, कुछ आत्माओं में विश्वास रखते हैं और पूरी श्रद्धा से खेलते हैं, और अधिकतर इसे मज़ाक में लेते हैं।
कमरे में अँधेरा और बिल्कुल सन्नाटा। कुछ समझ आता उससे पहले मुझे साथ लेकर प्लान‑चिट का खेल शुरू हुआ। गाँधी, नेहरू—पता नहीं किस‑किस की आत्माओं को बुलाने की कोशिश की गई। जिस तरह से कटोरी सभी की उँगलियों से चार्ट पर घूम रही थी, सब मान चुके थे कि किसी की आत्मा आ गई है। कुछ सवाल पूछे गए और जवाबों की चार्ट पर बने अक्षरों और अंकों से पुष्टि की गई। सभी उत्साहित थे। फिर सवाल पूछा गया कि पैसे किसने चुराए? तथाकथित आत्मा हमारी उँगलियों से कटोरी को मेरे नाम के अक्षरों की ओर ले जाने लगी—J‑H‑U‑R‑E… पूरा होता उससे पहले ही एक झटके में मैंने हाथ छोड़ दिया। कमरे में बिल्कुल शांति और सब की आँखें मुझे चीर रहीं थी। गुस्से में चार गालियाँ देकर, बड़बड़ाते हुए और बिना कोई सफाई या बहस किये कमरे से बाहर निकल आया। बहुत गुस्से और अविश्वास के साथ कमरे का दरवाज़ा बंद कर लिया। थोड़ी देर लगी समझने में कि हुआ क्या है, पर समझ नहीं आया कि मेरे दोस्तों—मेरे सबसे अच्छे दोस्तों—ने मेरे साथ ऐसा क्यों किया? क्यों? मुझसे सीधे बात कर सकते थे, मुझ पर भरोसा नहीं था, दोस्ती केवल दिखावा थी, और बीसियों सवाल दिमाग़ में घूमते रहे।
मुझे जैसे किसी ने 440 वोल्ट का झटका दे दिया हो। मैं टूट तो गया ही था, साथ में हमारी दोस्ती भी बिखर गई। उन दोस्तों से बातचीत बिल्कुल बंद—बल्कि कोई भी दोस्त नहीं रहा। अब मैं 400 लोगों के हॉस्टल में बिल्कुल अकेला था। और ज़्यादा सिगरेट, और ज़्यादा शराब। अकेले नशे में धुत्त, बंद कमरे में खुद से सवाल करता रहा। खिड़की के बाहर मानो आत्माओं ने डेरा डाल दिया हो। कमरे में जाने से डर लगने लगा। रोज़ कुछ बहाना करके किसी और के कमरे में सो जाता। कई बार रात बस अड्डे या स्टेशन पर निकलती और दिन में सोता।
पढ़ाई तो निबट गई थी—64%, सेकंड डिवीज़न। मतलब अब अच्छी नौकरी के लिए योग्य नहीं। कैरियर शुरू होने से पहले खत्म। पहले जब पैसे खत्म हो जाते थे तो जो दोस्त उधार देते थे, वो नहीं थे। जो लोग खाना खिलाने ले जाते थे, वो दूर‑दूर तक नहीं थे। बस एक और बुरी आदत लग गई—कुछ लोगों ने बिना पैसे दिए होटल से खाना खाकर निकलने का गुर सीखा दिया था। कुछ दिनों, कुछ हफ्तों तक ये चलता रहा। हिम्मत बढ़ती रही। होटल बदलते रहे।
एक दिन होना ही था—नवंबर की ठंड में आशीर्वाद होटल के मैनेजर ने पकड़ लिया। ठंडे पानी से बर्तन धुलवाए, अच्छे कॉलेज का वास्ता देकर और माफ़ी माँगने पर जाने दिया। जाते‑जाते वहाँ काम करने वाले एक हमउम्र लड़के ने कटाक्ष करते हुए कहा—
“तुम लोगों का सही है—बढ़िया मज़े से पेट भर खाओ, चार बर्तन धो और निकल जाओ।अपन को ठंड में घंटो बर्तन तो धोने ही पड़ते हैं, और झूठा खाना भी नहीं मिलता।”
नफरत और अवमान से भरा चेहरा मेरी आँखों में जैसे बस गया और उसके शब्द मेरे कानों में गूँजते रहे। जैसे वो प्लान‑चिट वाली आत्माओं ने जकड़ लिया हो। ख़ुद से घृणा हुई, बहुत शर्म आई, रोया भी और बहुत गुस्सा आया कि ये हालत बना रखी है। सिगरेट की वजह से ही मेरे पास खाने के पैसे नहीं बचते थे और ये नौबत आई। सिगरेट ही फसाद की जड़ थी। मैंने उसी वक़्त सिगरेट छोड़ने की ठान ली।
रात को ही खजराना गणेश मंदिर गया, और वहाँ कुछ ऐसा हुआ जैसे भगवान मुझसे मिले, मुझे गले लगाया और मैंने कसम खा ली कि सिगरेट अब कभी नहीं पियूँगा।
सिगरेट छूट गई और महीनों—बल्कि करीब डेढ़ साल, तीन सेमेस्टर तक—उन दोस्तों से बातचीत नहीं हुई। फिर कॉलेज के आख़िरी साल में गिले‑शिकवे दूर हुए। 30 साल बाद भी —अभी तक बुरे सपने आते हैं, अभी तक ऐसा लगता है कि आत्माएँ पीछा कर रही हैं, और अभी तक उन दोस्तों की आँखें चीरती हैं।
उस दिन जो हुआ वो मेरे लिए किसी चमत्कार से कम नहीं था। मैंने भगवान को साक्षात महसूस किया। मैंने भगवान को देखा और भगवान ने सबसे अच्छा दोस्त बनकर मेरा साथ दिया। आज भी वो आत्माएँ कभी-कभी जकड़ लेती हैं और आज भी भगवान साथ खड़े होते हैं। कल रात भी कुछ ऐसा ही हुआ। आधी रात को भयानक सपने से नींद टूटी। फिर वही सपना, अंधेरा कमरा, प्लान-चिट का खेल, चीरती आँखें और डरावनी आत्मायें जकड़े हुए। पसीने में लतपत, घबराहट से फिर नींद टूटती और फिर मैं अपने आप को दिलासा देता कि सो जाओ सपना है। भगवान को याद करता और फिर वापस सो जाता। प्रतिदिन भगवान का धन्यवाद करता हूँ। धन्यवाद !!!
तब से अब तक, तीस सालों में, दो या तीन बार ही सिगरेट को हाथ लगाया होगा, एक बार बीते साल हमारे बैच की पच्चीसवीं सालगिरह - silver jubilee की पार्टी में उन्ही पुराने दोस्तों के साथ।
