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कुछ किस्से कहानियाँ - मति - Hindi Stories - Wisdom - Re Kabira 125

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मति "जाको प्रभु दारुण दुख देही, ताकी मति पहले हर लेहि" - बब्बा ने अखबार में छपे हुए लेख को पढ़कर, पन्ना मेरी तरफ आगे बढ़ा दिया।   "तुमको ये पढ़ना चाहिए" - बब्बा ने कहा।  मैंने पूरा लेख पढ़ा, १० दोहों के माध्यम से दैनिक जीवन, नैतिकता और व्यवहार को लेकर किसी ने निबंध लिखा था। जब पढ़ने के बाद मैंने अखबार के पन्ने बब्बा को वापस दिए, उन्होंने उस लेख को दोबारा पढ़ा।   "एक दोहा तो सुंदरकांड का है, दूसरा पता नहीं कहाँ से लिया गया है" - बब्बा ने एक बार फिर से दोहे तो पढ़ा।   बब्बा बची हुई अखबार की खबरें पढ़ते रहे और मुझे खेल वाले पृष्ठ पकड़ा दिए। बीच-बीच में बब्बा ने मेरी पढ़ाई सम्बंधित सवाल पूँछे। आगे क्या पढ़ना है?, कौनसे विषय पढ़ते हो?, स्कूल में कैसे नंबर आते हैं? और बहुत सी बातें हुई। अख़बार को खिड़की पर रखने दिया और इशारा कर के तख़त पर बुआलया।  मैं समझ गया था कि मुझे उनके पैर दबाना है।   पता नहीं किस बात से उनका ध्यान तुलसीदास जी के दोहे पर फिर से गया। उन्होंने मुझ से बोलै - "तुमको - जाको प्रभु दारुण दुख देही, ताकी मति पहले हर लेहि - का मतलब समझ आया?"...