Hindi Poem - Likelihood - संभावना- Cancer - Re Kabira 131
कैंसर / Cancer / कर्क रोग, शब्द सुनकर ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं। सोचने समझने का शक्ति दम तोड़ देती है और दुनिया को देखने का नज़रिया एक क्षण में बदल जाता है। कुछ सालों में खास लोगों को खोया, पर पिछले महीने शिखा के मामा के साथ १० दिन मुंबई में कैंसर अस्पातल के चक्कर काटने के बाद मानो कुछ बदल सा गया। उन भावनाओं को व्यक्त करती कविता - संभावना। संभावना भीड़ ही भीड़ चारों तरफ, अजब सा शोर, अजीब सी ख़ामोशी, नित्य नम आँखें, ठहरे हुए आँसू, चेहरे पे कठिन मुस्कुराहटें, बेचैन मन की बौखलाहटें, माथे पर मजबूरी की लकीरें, झुके हुए काँधे, थकी हुई बाहें, भटके हुए जाते जा रहे हैं, दिशाहीन कदम बढ़ाते जा रहे हैं, ज़िम्मेदारी का बोझ लिए, बस भागते जा रहे हैं, फिर भी उस भीड़ में वो लोग, कहीं नहीं जा पा रहे हैं... उदासी ही उदासी चारों तरफ, ये इतना दुःख कैसे हैं झेलते, माँ की छाती से चिपके बच्चे, न खेलते, न हँसते, न खुलकर रो सकते, अपनी छोटी सी दुनिया में बसते, चुबती नलियों क्यों हैं, कहाँ समझते, काँपते हाथ पिता के, बेटे की व्हीलचेयर को धकेलते, बेटी पिता की गोद रोती चुप्पी साधे, माँ का ...