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Hindi Poem - Summer - ग्रीष्म ऋतु - Re Kabira 129

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ग्रीष्म ऋतु नौ तपा अभी लगा नहीं  पारे पर रोज रिकॉर्ड  तोड़ने का बुखार चढ़ा रात को १२ बजे तक  लगे लू के थपेड़ों का डर जहाँ देखो वहीं छपी तड़पती-तरसती-तपती धरती की खबर असहनीय भीषण  भयंकर गर्मी नदि-नाले-तालाब कुएँ सूख रहे  जंगल जल रहे  पशु-पछी झुलस रहे  लपटों से लोग मर रहे  अख़बारों की सुने अगर  पृथ्वी खतरे में है पृथ्वी खतरे में है? प्रकृति नहीं मनुष्य  खतरे में है मतलबी-लालची-मूरख इंसान ! तू खतरे में है ! लालिमा   ४ बजे जब मम्मी उठती धरा तब भी आहें भरती धीमी गहरी साँसे ले दोनों आलोम-विलोम गिनती  सटक से पानी जैसे ही  रात भर के प्यासे  धूल की परतों में लिपटे  पौधों के मुरझाये झुलसे   पत्तों पर पड़ता  पीड़ा हरता  उनका दिल ख़ुशी से झूम उठता क्यारियों की लाल माटी महकती  ऊँची डाल पर बैठी मैना चहकती धीरे-धीरे सूरज की किरणें  सितारों में लपटी  रात की चादर को सरकाके क्षितिज चीरती  थके बादलों को लालिमा से सजाती तालाब के पानी को लाखों  माणिक मोतियों से चमकाती चुपके से मेरे कमरे में ...