Hindi Poem - Oneself - अकेला - Re Kabira 130
अकेला
भीड़ थी, शोर था
रंग थे, खुशबुओं से महका समाँ था
मुस्कुराते, गुनगुनाते,
खिलखिलाते चेहरे,
जहाँ देखो वहाँ,
मुखौटों का रेला था
शमाओं की धुन पर,
नाचते परवाने,
मदहोश, सरफ़रोश,
दीवानों का खेला था
नसीहतों में मशरूफ,
अनजाने बेगाने,
मशहूर मारूफ़,
बुतों का मेला था
भीड़ थी, शोर था,
अँधेरा था, जुगनुओं से चमका चमन था
दौलत की, शोहरत की चकाचौंध में,
चाँद के लिए हैरान-परेशान चकोर था,
दावतों में, यारों की महफ़िलों में,
फ़रमाइशों का ज़ोर था,
वहीं किसी कोने में,
कहीं छुपा किसी का चितचोर था,
कोई नाचता, कोई गाता,
कोई झूमता, जाम से जाम मिलाता,
कोई नामों के दाम लगाता,
नज़रों के खेल में,
कोई नज़रें चुराता,
कोई छुपाता तो कोई नज़रें मिलाता,
कोई बार-बार खो जाता, गुम हो जाता,
तो कोई बार-बार टकरा जाता, हर बार मिल जाता
भीड़ थी, शोर था,
रास्ते थे, मोड़ों में उलझा वो खड़ा था
भीड़ में, शोर में,
मुस्कुराने, खिलखिलाने की होड़ में,
तेज़ भागने, दूर जाने की दौड़ में,
रंग में, रागों में, ख़्यालों में,
लगा खोया था,
पर असल में आँखें खोल,
वो सोया था,
अनजानों में, बेगानों में, पहचान ढूँढता,
बड़े पायदानों पर जो चढ़े, उनमें नाम ढूँढता,
न नज़रें चुराता, न नज़रें मिलाता,
अपनी चीरती निगाहों से,
बेसुध ख़्वाबों में बहता,
किसी और दुनिया में चला जाता,
फिर सपनों को बुन,
बादलों पर सवार,
तारों संग,
भीड़ में, शोर में,
वापस आ जाता!
भीड़ थी, शोर था,
रेला था, खेला था, मेला था,
वहाँ कोई अकेला भी था
भीड़ में, शोर में,
कोई अकेला था!
