कुछ किस्से कहानियाँ - मुफ्त की सलाह - Hindi Stories - Free Advice - Re Kabira 120
मुफ्त की सलाह
"ताऊजी हमारे स्कूल में तबला सिखा रहे हैं, मैं सीख लूँ?" ताऊजी से मैंने पूछा।
"गवैया, तबलची बनना है क्या?" ताऊजी ने कटाक्ष करते हुए और व्यंग्यात्मक स्वर में मम्मी की तरफ देखते हुए कहा।
ताऊजी घर के भाइयों में बड़े, पेशे से इंजीनियर और ताईजी स्कूल में टीचर थीं। इसलिए पापा-मम्मी को हमारे स्कूल, पढ़ाई या करियर के बारे में जो भी पूछना होता था तो ताऊजी-ताईजी की सलाह ली जाती थी। हम लोग शनिवार / रविवार का इंतज़ार करते थे की वो आयें और हम भैया के साथ खेलें। पापा-मम्मी और परिवार के बाँकी सदस्य उनसे उनकी अलग-अलग विषयों पर राय लेते।
मेरे बचपन के ५ साल की पढ़ाई जबलपुर के खालसा स्कूल में हुई। वहां गुरद्वारे में तबला प्रार्थना के साथ में बजाया जाता था और स्कूल के बाद सिखाया भी जाता था। म्यूजिक टीचर ने मुझे कुछ और लोगों के साथ तबला सीखने के लिए चुना। मैं सीखने के लिए उत्त्साहित था, पापा से पूछा। सप्ताहांत था और ताऊजी को आना था इसलिए पापा ने ताऊजी से पूछने को कहा। ताऊजी के जवाब के बाद वह किस्सा वहीं खत्म हो गया, न किसी ने मुझ से पूछा और न ही समझाया। पता ही नहीं था गवैया और तबलची क्या होता है और ताऊजी ने इतनी घृणा से क्यों कहा था?
एक साल बाद छुट्टियों में कुछ दिन रहने के लिए ताऊजी के घर गया था। बहुत कुछ देखा, बहुत कुछ सीखा और समझा। पर बहुत आश्चर्य हुआ जब वहाँ भैया, ताऊजी के लड़के, को गाते और बोंगो बजाते देखा। तब भी समझ नहीं आया, की ताऊजी ने मुझे तबला सीखने के लिए क्यों मना किया था? क्या वजह रही होगी?
पढ़ाई में कुछ खास मन नहीं लगता था, जैसे तैसे पास हो जाता था। मम्मी मुझ से ज़्यादा मेहनत मुझे ही पढ़ाने के लिए करती थीं। कई बार ताईजी से थोड़ी मदद ली, पर नतीजा ये निकला कि बेवकूफ़ घोषित कर दिया गया। "इसका कुछ नहीं हो सकता, बस शैतानी करवा लो" इन शब्दों के साथ दो चांटे जड़ दिए जाते। और परीक्षा का परिणाम आता, तो मूर्खता सिद्ध हो ही जाती थी। कुछ समय के लिए मैंने घर के सामने टाइपिंग सीखी। सहपाठी के पिता जी का टाइपिंग स्कूल था तो वहीं उसके साथ सीखने लगा। मम्मी के लिए भी आवारागर्दी से अच्छा था की मैं कुछ सीख लेता। ताऊजी ने वो भी छुड़वा दिया - "क्लर्क बनाना है क्या?"
पाँच साल के बाद पिता जी का तबादला हो गया, हम लोग दूर दराज़ के छोटे से शहर बिश्रामपुर में चले गए। छोटी जगह थी, स्कूल में कम बच्चे थे। वहाँ पढ़ाई में मन लगने लगा, टीचरों में भी बहुत धैर्य था और पढाई में मुझसे और भी कमज़ोर बच्चे थे। टीचरों के प्रोत्साहन से अच्छे नंबर आने लगे। स्कूल के स्पोर्ट्स टीचर फ़ौज से रिटायर्ड थे। हमेशा टाइम पर, चुस्त-दुरुस्त, और बहुत सारे किस्सों के साथ। हमेशा कोई न कोई कहानी सुना कर प्रोत्साहित करते। उनकी बातें और रोचक कहनियाँ सुन कर फौज में जाने का उत्त्साह बना। उन से पता चला की NDA की परीक्षा होती है फ़ौज में अफसर बनने के लिए। गर्मियों की छुट्टियों में जबलपुर गया था। ताऊजी - ताईजी हमेशा की तरह शनिवार या इतवार को घर आये हुए थे। मैं चाचा की दुकान पर बैठा था, उन्होंने ऊपर मिलने बुलवाया। थोड़ी बहुत इधर उधर की बात हुई। फिर ताऊजी ने पूँछा - " क्या बनाना चाहते हो? कुछ सोचा?"
मैंने कहा - "NDA की परीक्षा देना चाहता हूँ, आप बताइये कैसे तैयारी करुँ?"
"रंगरूट बनना है क्या? १०वीं बोर्ड की तैयारी करो" - ताऊजी ने डाँटते हुए कहा।
बस उस दिन फौजी बनने की इच्छा मसल दी गयी। "रंगरूट" आज तक कानों में गूँजता है।
१०वीं की पढ़ाई में लग गया। पिछले साल की तरह इस साल भी परीक्षा के बाद जबलपुर चला गया। बोर्ड की परीक्षा जल्दी हो जाती थीं तो लम्बी छुट्टी थी। सुबह ५ बजे से १० बजे तक टेबल-टेनिस सीखने जाता, दिन में चाचा की दूकान पर बैठता, और शाम को बब्बा से खाने के बाद बातें। परीक्षा का रिजल्ट आया, अच्छा था, स्कूल और शहर में पहला स्थान था ८० प्रतिशत से थोड़े कम अंक थे। सब को खुशी थी, बब्बा ने आशीर्वाद के साथ २ रूपये दिए, चाचा ने चाट खिलाई। ताऊजी-ताईजी को बताया, तो उन्होंने कुछ ऐसा कहा "तुम्हारे भैया के १०वीं में ८८ प्रतिशत थे।" याद नहीं की ८८ थे या ९० या ९५ , पर और कुछ नहीं कहाँ, कुछ भी नहीं, कोई आशीर्वाद नहीं, कोई शाबाशी नहीं। वैसे सही था, मुझसे पास होने तक की उम्मीद नहीं थी और करीब ८० प्रतिशत ले आया।
पिताजी का फिर ट्रांसफर हो गया, इस बार हम भोपाल वापस पहुँच गए। १०वीं में अच्छे नंबर थे, विज्ञान-गणित हायर-सेकेंडरी के लिए चुना। गणित ले तो लिया, पर आगे क्या करना था, उसका पता नहीं था। गणित के छात्रों के लिए इंजीनियर ही करियर विकल्प था, और किसी करियर के बारे में उस समय पता ही नहीं था। जब तक पता चलता इंजीनियरिंग कॉलेज में दाखले के लिए क्या करना होता है ६-८ महीने निकल गए। पढ़ाई चालू की, कोचिंग जोर शोर से शुरु की। फिर ११वीं की छुट्टियों में जबलपुर आये, फिर शनिवार / इतवार तो ताऊजी-ताईजी आये और फिर उन्होंने पूँछा क्या कर रहे हो।
"मैथ-साइंस लिया है, इंजीनियरिंग की तैयारी कर रहा हूँ" - मैंने जवाब दिया।
"इंजीनियरिंग क्यों कर रहे हो, सब इंजीनियर मारे-मारे फिर रहे है" - ताऊजी ने मुझे समझते हुए कहा।
"पॉलिटेक्निक करवाओ, भविष्य में नौकरी के ज़्यादा मौके मिलेंगे। पॉलिटेक्निक के बाद इंजीनियरिंग में दाखिला भी मिल सकता है।" - उन्होंने पापा से कहा।
मैंने टोकते हुए कहा - "पर भैया भी तो इंजीनियरिंग की पढाई कर रहे हैं।"
"उसकी बात अलग है" - ताऊजी ने कहा।
उनका जवाब अभी तक, आज तक मेरी समझ के परे है। क्यों अलग? ऐसा क्या था जो मेरे लिए पॉलिटेक्निक ठीक था और भैया के लिए इंजीनियरिंग। कुछ तो रहा होगा। फिर इधर उधर की बातें होने लगी। मैंने फिर मुद्दा छेड़ा और कहा - "भैया की किताबें और नोट्स दे दीजिए। मेरे काम आ जायेंगे।"
"वो नोट्स और किताबें इंजीनियरिंग में भी काम आती हैं। तुम को खुद ही नोट्स बनाना चाहिए। " - ताईजी ने कहा।
मैं समझ गया कि, जो करना है वो खुद ही करना पड़ेगा। ये लोग सही सलाह नहीं देंगे, ये लोग मदद भी नहीं करेंगे। समय निकलता गया, पढ़ाई चलती रही। १२वीं में पढ़ाई से ध्यान भटक गया और इंजीनियरिंग कॉलेज की परीक्षा में अच्छी रैंक नहीं आयी। मेरी १४२८ रैंक, ९८० कट-ऑफ रैंक थी। कुछ समय साइंस कॉलेज में एडमिशन लिया, फिर कुछ समय एग्रीकल्चर पढ़ा और फिर जोर शोर से इंजीनियरिंग की पढ़ाई की और दूसरे प्रयत्न में ३४० रैंक के साथ इंजीनियरिंग में दाखिला लिया।
अच्छी खबर थी, सब के साथ ताऊजी-ताईजी को भी बताया। शायद रैंक भैया से काफी अच्छी थी, इसलिए कोई प्रतिक्रिया नहीं, कोई आशीर्वाद नहीं, कोई शाबाशी नहीं। मानो जैसे मैंने किसी का कुछ छीन लिया हो।
रिजल्ट के बाद बब्बा के साथ थोड़ा वक़्त बिताने जबलपुर आया, अच्छे रिजल्ट के लिए उन्होंने आशीर्वाद दिया, ५ रुपये दिए और २ रुपये की रबड़ी लाने भेज दिया। वो बहुत खुश थे। हमने खूब इधर उधर की बातें की उन २० दिनों में। बहुत सी बातें, उन्हें मैंने ताऊजी-ताईजी की सलाहों के बारे में बताया। बब्बा ने जो समझाया आज और भी उचित प्रतीत होता है। उन्होंने कहा,
यदि सलाह लेते हो तो उनसे जो तुम्हारे लिए अच्छा सोचते हैं, हो सकता है उनकी सलाह सही न निकले पर पर यदि उनकी नियत सही है तो तुम्हे सही रास्ता मिल ही जाएगा।
सलाह देते समय ये याद रखा करो की तुम उस परिस्थिति में क्या करते या क्या करोगे।
सलाह में झूठ या छल नहीं होना चाहिए, नियत साफ़ होनी चाहिए।"
उसके बाद भी मुझे ४० वर्षों में बहुत सी गलत सलाह मिलीं, हर बार सीख ही मिली। मुफ्त की सलाह कीमती कैसे हो सकती है।
मुझे तबला सीखने का मौका उस घटना के लगभग ३० वर्ष के बाद तब मिला जब मैंने अपने बेटे को सिखाना शुरु किया। ४० साल की उम्र में संगीत सीखना बहुत ही मुश्किल था, पर शौकिया सीख ही लिया और अभी भी सीख रहा हूँ। खुशी इस बात की है की बेटा अब बहुत ही अच्छा तबलची है और गाता भी है ,और अगर बेटा गवैया और तबलची बनना चाहे तो और भी ख़ुशी होगी।
अधिकतर लोग इस बात को नहीं समझते सलाह देना एक बहुत बड़ी शक्ति भी है और बहुत बड़ी जिम्मेदारी भी। इसलिए सलाह बहुत सोच विचार कर लें और बहुत ज़िम्मेदारी के साथ दें।
Ashutosh Jhureley
@OReKabira
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