कुछ किस्से कहानियाँ - बौखलाहट - Hindi Stories - Rage - Re Kabira 122

बौखलाहट

छोटे चाचा का व्हाट्सप्प पर वीडियो के साथ सन्देश था कि बारिष के बाद हमारे पुश्तैनी घर की एक तरफ की दीवार सुबह ४ बजे के करीब गिर गयी। भारी बरसात हुई थी और कुछ दिन पहले पड़ोसियों ने अपना मकान गिरवाया था। जो साझा दीवार थी, वो कमजोर हो ही चुकी थी। अब गिरी की तब, जैसी हालत थी। अन्तः धड़-धड़ा कर, १६ इंच की, १५० साल पुरानी दिवार ढह गयी।  

उस दिन झरझराती इँट-माटी-चुने की भीत ने कुल की नीव को उजागर कर दिया था और उसके बाद की प्रक्रिया ने जो उघाड़ा वो सच था, कटु सच।  चोरी-धोखा, छल-कपट, लालच-तृष्णा, लानते-धमकियाँ; माँ को बच्चों को मारने की धमकियाँ दे दी गई।  सच से बौखलाहट, झूठ की परतें, रिश्तों के मायने, खोटा प्रेम, खोखला मान-सम्मान; एक-एक करके दिल की  झुंझुलाहट और घृणा जुबान पर आ गई। अहसान फरामोशी की कलम से भविष्य के संबंधों को लिख दिया। सब साझा मिट गया। घर का सौदा चैत्र की नवरात्री के प्रथम दिन पूरा होना तय हो गया। 

पुश्तैनी घर था, मुफ्त का था, पीढ़ी-दर-पीढ़ी सभी अपने-अपने मतलब निकालते रहे। जो जितना खींच सकता था खींच लिया, जो जिसको जितना नोच सकता था नोच लिया और जो जितना गिर सकता था गिर गया। जिन लोगों ने अपना हक़ जताया, उन्होंने घर कमाया तो था नहीं, उनका तो कुछ था ही नहीं।  जिसका था उसको तिरस्कार, अपमान और अवहेलना ने समय से पहले ही मार दिया था। 

मुझे घर नहीं बेचना था, मेरा क्या अधिकार था जो में बोल सकता कि मत बेचो? मेरा विरोध करने पर और बेचने के फैसले पर दुःख व्यक्त करने पर, तरह-तरह के जवाब मिले।  

ताऊजी ने कहा - "तुम्हे खरीदना हो तो बताओ, अभी सौदा रोक देते हैं?"

पापा ने कहा - "जो वहाँ रह रहे हैं, वो ही लड़े मरे जा रहे हैं तो क्या कर सकते हैं? वो यदि बोलते कि नहीं बेचना है तो कौन बेच रहा था।  जर-जर हालत हो गयी है,  किसी पर गिर गया तो दुर्घटना हो जाएगी और लेने के देने पड़ जाएँगे।"

बड़े चाचा ने लिखा - "पुश्तैनी सम्पति को विवादित बनाने में कोई समझदारी नहीं है"

जिन चाचा की बेचने की ज़िद थी, उन्होंने सुना दिया - "हमारे पिताजी ने दसियों बेच दिए, जे भी बिक गओ तो का हो गओ?"

छोटे चाचा बोले - "सब ने जीना मुश्किल कर रखा है, बेचो बेचो बेचो, हओ बेंच दो !"

मैंने छोटे चाचा से पूछा कि फिर क्यों बेचने को तैयार हुए - "क्यों साइन करे?"

इन सब के मेरे पास जवाब थे और बहस कर सकता था, पर इसका जवाब मेरे पास नहीं था, मम्मी ने ऊँची आवाज़ में कहा - "तुम किस हक़ से बोल रहे हो कि नहीं बेचना? तुम्हारे बाप का है क्या?" 

ये पहली बार नहीं हो रहा था।  ठीक ४० वर्ष पूर्व, चैत्र की नवरात्री पर भी ये ही नौटंकी हुई थी। फर्क इतना था कि पीढ़ी पिछली थी। ४ भाइयों की लड़ाई में, एक पुस्तैनी घर तो मिटा ही था, साथ में एक भाई की जान भी चली गयी थी। जो सबसे सक्षम था उसने सबसे अधिक उत्पात मचाया, और जो सबसे कमज़ोर था उसने खुद की ही जान ले ली।  अंतिमसंस्कार के लिए केवल कपड़े ही थे। 

"किसी भी तरह सुलझ जाए, कोई अनहोनी न हो जाए"  - पापा की सबसे बड़ी चिंता।  

मैंने मम्मी से कई बार लड़ाई की, बहस की - "खरीद लेते हैं, कम-से-कम बचा रहेगा?"

"तुम समझते नहीं हो, इन लोगों ने पूरी ज़िन्दगी तो पापा को नोच खाया है। अब जितनी ज़िन्दगी बची है वो चैन से जी लेने दो।  जब आते हो, नौटंकी कर के चले जाते हो। तुम्हारा घर में घुसना बंद कर देंगे, तब सुधरोगे"  - मम्मी ने गुस्से से डांट दिया।

जब मम्मी शांत हो जाती तो कहतीं - "जिस को जो तमाशा करना है, करने दो।  बस देखते जाओ। भगवान् को जो करवाना है, वो ही होगा।"

किसी का गुणा-भाग था कि कैसे बहनो को हिस्सा न दिया जाए, तो किसी ने हिसाब में बाई-बब्बा की सेवा की कीमत लिख दी, किसी ने बीच वाले चाचा की दवाई के खर्च का ब्यौरा दे दिया और किसी ने चाट-पोहा गिनवा दिया। 

जैसे-जैसे बेचने की प्रक्रिया आगे बढ़ती रही, वैसे-वैसे सभी के असली चेहरे सामने आते रहे।  मम्मी की भाषा में - "सारे जिन्न बहार निकल आये।"

मेरी भी २५ साल पुरानी डायरी के पन्ने खुलने लगे। २००४ तक मेरी डायरी में ४८ अध्याय मिलौनीगंज के हैं। अधिकत्तर मेरे अनुभव, स्वगत, घटनाएँ जिनका में साक्ष्य था और बहुत सारी बातें जो मैंने बब्बा, बाई, पापा और मम्मी की।  कुछ मेरी चिता के साथ ही मट्टी में मिल जाएँगी और अधिकांश को अब निजी रखने का कोई फायदा नहीं है। कुल का साझा जो था, अब मिट चूका है।  मैंने अपने डायरी साझा करना चालू कर दिया। 

४ अध्याय साझा किये, मेरा सच! जो मेरा हक़ था वो मांग लिए, जो मेरा सच था वो लिखा। 

नतीजा ये हुआ की बचा हुआ सच सामने आ गया - जो मम्मी पापा, मेरे और छोटे के लिए घृणा लोगों ने सालों से दबा रखी थी, सतह पर आ गई। जैसे पानी की सतह पर तेल तैरने लगा हो।  

छोटे चाचा की स्वयं की पीड़ा और घाव फिर ताज़ा हो गए, छोटी बुआ ने आदतानुसार बातों को इधर-उधर करना चालू कर दिया और मम्मी के संघर्षों की तो ये कथा है ही।  हमेशा की तरह, पीठ पीछे बातें शुरु - कोई अपनी सफाई दे रहा, तो कोई अपना बचाव करने में व्यस्त और कोई मनगढ़ंत आरोप गढ़ने में लग गया। कोई नयी बात नहीं! 

पर भैया - ताऊजी के बेटे, की प्रतिक्रिया की उम्मीद नहीं थी, पर आश्चर्य भी नहीं हुआ। मेरी कहानी पर प्रतिक्रिया, मुझ पर करने की जगह उन्होंने मम्मी तो फ़ोन लगा तहस में मुझे मारने की धमकी दे डाली - 

"जहाँ भी है, ढूंढ कर निकाल लूँगा।" 

माँ को बेटे को मारने के धमकी, वो भी उसने जिसने दो दिन पहले कहा था - "मैं भी तो आपके बेटे जैसा हूँ। "  

कुछ ही समय बाद चाचा १० कदम और आगे बढ़ गए, फ़ोन पर न केवल मुझे बल्कि मम्मी-पापा को मारने, पीटने और खत्म करने की धमकी दे डाली - 

"भोपाल आ गए तो ये मत समझना कि कुछ नहीं कर सकता।  एक फ़ोन कर दओ तो गुंडे घर में घुस कर खत्म कर देंगे। घर से बहार निकलवो मुश्किल हो जे है। सम्भालो अपने बेटे तो, दोनों लौंडे कहाँ गायब हो जे हैं। पता भी नहीं चलेगो।"

उससे से भी मन नहीं भरा, पापा को चोर और धोकेबाज ठहरा दिया। दगाबाजी का लालछन लगा दिया।  

पापा को जब बताया तो उनके नीचे की जमीन खिसक गयी। निस्स्वार्थ, ताउम्र, आँख बंद कर छोटे भाइयों पर जो भरोसा किया, उसका ये नतीजा मिला।  मैंने पापा से कहा की आप चाचा के बात करके स्पष्ट कीजिये।  होना क्या था - पापा फ़ोन करते रह गए, सन्देश करते रह गए पर कोई जवाब नहीं आया। 

मैंने भी दसियों फोन लगाए, कोई जवाब नहीं।  सन्देश भेजा - "चाचा फ़ोन उठाइए, ताकि पापा के लिए आपने जो कहा वो स्पष्ट किया जा सके।  अन्यथा मैं उसे आपका एक और झूठ समझकर नज़रअंदाज़ कर दूँगा। "

"आपने पापा के ऊपर बहुत बड़ा इल्ज़ाम लगाया है, स्पष्ट करना बहुत ज़रूरी है।  नहीं तो आपको इस पाप के साथ बाँकि उम्र जीना पड़ेगा। " - मुझे ब्लॉक कर दिया। 

कोई जवाब आ भी नहीं सकता था - चाचा ने अपना पूरा जीवन चोरी, जुआ-सट्टे, धोखाधड़ी और ठगी में बर्बाद कर दिया।  अपना तो किया ही, अपने परिवार का जीवन कष्टों से भर दिया। और अब आगे के लिए, अगली पीढ़ियों के लिए भी सारे दरवाज़े बंद कर दिए।

ताऊजी ने पापा को सन्देश लिखा "समझाओ इसको, क्या लिख रहा है? हमने इसका क्या बिगाड़ा है?"

क्या बिगाड़ा है - मेरा और छोटे का बचपन बर्बाद कर दिया, बब्बा को छीन लिया और पापा-मम्मी का जीवन कलेश से भर दिया।  शायद काफी नहीं था। 

ये भैया और चाचा की बौखलाहट ही थी, सच सुन कर बौखलाहट।  वो सच न सुन सके, और मुझ पर जो बीती उसकी मैं शिकायत भी नहीं कर सकता। बड़ा बनने और बड्डपन मनवाने की जगह, यदि वो अपना बड़े होने कर फ़र्ज़ निभाते, तो शायद ये परिवार कुछ और ही होता। घर घरौंदा होता!


दुकाने बिकीं, इधर एक मकान बिका, उधर दूसरा,
सोना बिका, चाँदी बिकी, 
झूमर, झालर, शीशे, हांड़ी, बर्तन, बीके,
कटोरी, गिलास, लोहा-लंगड़ भी बिक गया,

मेरी धुप में, छाँव में, बारिष की फुहार में,
खुशियों के रंग में, दुःख के रण में,
थका-हरा, समय का फेर देखता,
मेरा घर वहाँ डट कर खड़ा रहा,

पर जब मैंने - घर को हिसाब‑किताब के तराज़ू में तौल दिया,
उनके हाल पर छोड़ दिया,
गिरती दीवरों को, टपकती छतों को, 
उजड़ती तुलसन को, उखड़ते आँगन को, 

रिश्तों के मायने बदल गए,
उनके भी बही-खाते बन गए,
ज्यों ही बड़े समेटने लगे,
छोटों के मुँह चलने लगे,

मान सम्मान बन गया लानत-इल्ज़ाम,
और खींचो, और नोचो,
अब फिर कहाँ मौका मिलेगा,
आगे कौन मुड़ के देखेगा,

उसने मुझसे पूछा — "क्या मैं मात्र ईंट, चुना और पत्थर ही था?"
बताओ, मैं कैसे सर झुका खड़ा रहूँ?
और कितनी अवहेलना सहूँ?"
देखो, अब भीतों ने भी कैसे मुँह मोड़ लिया।"

मैंने कहा — "मैं तेरी रूह, कुछ तस्वीरों में ले जाऊँगा,
दूर कहीं फिर अपना घोंसला बनाऊँगा,
पता बदल जाएगा, तुम भटक मत जाना,
सुनो… तुम फिर मेरे घर को घरौंदा बनाना!"



आशुतोष झुड़ेले
Ashutosh Jhureley
@OReKabira

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 "यह एक काल्पनिक कहानी है। किसी भी जीवित या मृत व्यक्ति से समानता मात्र एक संयोग है।"









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