Hindi Poem - Nest - घरौंदा - Re Kabira 0123
घरौंदा
दुकाने बिकीं, मकान बिके,
बिक गए बड़े-बड़े गोदाम,
बिका सोना, चाँदी बिकी,
बिका पीतल का सामान,
बिक गए बड़े-बड़े गोदाम,
बिका सोना, चाँदी बिकी,
बिका पीतल का सामान,
झूमर, झालर, शीशे, हांड़ी, बर्तन बिके,
कटोरी-गिलास, लोहा-लंगड़ बिका,
बिक गई ४ फुटा दो नाली की शान,
बेच-बेच कर ढका रहा छुपा रहा मान,
धुप में, छाँव में, बारिषों की फुहार में,
गगन की गर्जन में, धरा की कंपन में,
शादी-विवाह, चौक, तीज, त्यौहार में,
खुशियों के रंग में, दुःखों के रण में,
ऊँचा पूरा, हवा दार, सुंदर और आलिशान,
बड़े-बड़े खिड़की दरवाज़े,और विदेशी शीशे,
गद्दी, मंदिर, आँगन और खूबसूरत छतजे,
कितने जीने और छोटे-बड़े कितने ही कमरे,
अँगरेज़ चले गए, रजवाड़े मिट गए,
कितने नेता आए, कितने चले गए,
थका-हारा, समय का फेर देखता रहा,
मेरे बब्बा का घर वहीं पर डटा रहा,
गिरती दीवरों को, टपकती छतों को,
उजड़ती तुलसन को, उखड़ते आँगन को,
जब हमने उनके हाल पर छोड़ दिया,
घर को हिसाब‑किताब के तराज़ू में तौल दिया,
चोरी-धोखा, छल-कपट, लालच-तृष्णा,
लानते-धमकियाँ, सच की बौखलाहट,
झूठ-फ़रेब की परतों में लिपटी ,
दिखावे की चादर को ओढ़ लिया,
रिश्तों के मायने बदल गए,
उनके भी बही-खाते बन गए,
ज्यों ही बड़े समेटने लगे,
छोटों के मुँह चलने लगे,
आखिर ऐसा मौका फिर किसे कहाँ मिलेगा,
सौदे के बाद फिर कौन कहाँ पीछे मुड़ेगा,
और खींचो, और नोचो, चाहे जो हो अन्जाम,
देखो कैसे मान-सम्मान बन गया लालछन-इल्ज़ाम,
उसने मुझसे पूछा — "क्या मैं मात्र ईंट, चुना और पत्थर ही था?"
बताओ, मैं और कब तक सर झुका खड़ा रहूँ?
और कितनी उपेक्षा, कितनी अवहेलना सहूँ?"
देखो, अब भीतों ने भी कैसे मुँह मोड़ लिया।"
“कमज़ोर हो गया हूँ, लाचार हो गया हूँ,
गिरता जा रहा हूँ, बिखरता जा रहा हूँ,
नर्बदा की माटी हूँ, मुझे मैया में फिर छोड़ दो ,
मुक्त करो, अब तुम भी मोह का बंधन तोड़ दो।”
मैंने कहा — "अब कुछ भी साझा बचा नहीं,
जिनको कह सके हमारे खड़े नहीं,
आज घर का सौदा निबट गया,
हमारा नाम मोहल्ले से मिट गया"
"मैं तेरी रूह, कुछ तस्वीरों में ले जाऊँगा,
दूर कहीं फिर अपना घोंसला बनाऊँगा,
पता बदल जाएगा, तुम भटक मत जाना,
सुनो! तुम फिर से मेरे घरौंदे को घर बनाना!"
आशुतोष झुड़ेले
Ashutosh Jhureley
@OReKabira
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