बार-बार जन्म लेता रहा तू - Hindi Poetry - Re Kabira 111
-- o Re Kabira 111 o -- जबलपुर के एक वन्य अभ्यारण्य में मेरी मुलाक़ात करिया चौकीदार से हुई। उम्र साठ के पार, चेहरे पर संघर्ष की रेखाएँ और आँखों में जीवन की अनकही कहानियाँ। चार हफ़्तों तक कई सुबह वह मिलता रहा—धीरे‑धीरे पहचान बनी, और फिर इधर‑उधर की बातें भी होने लगीं। मैं वहाँ प्रवासी पक्षियों की तस्वीरें लेने जाता था। कैमरा और इस शौक को देखकर वह बार‑बार पूछता—“इससे होता क्या है? पैसे मिलते होंगे? सरकारी नौकरी है या प्राइवेट? दो‑चार लाख का कैमरा होगा?” उसके सवालों में जिज्ञासा भी थी और जीवन के व्यावहारिक अनुभवों की झलक भी। जवाब देते‑देते हम दोनों के बीच एक सहज आत्मीयता जन्म ले चुकी थी। करिया का जन्म 1964 या 65 में राखी के आस‑पास कुररी गाँव में हुआ था। वह उनके कुल में 20 साल बाद, 14 लड़कियों के बाद पहला लड़का था। माता‑पिता की पाँचवीं संतान। बहुत ख़ुशी और हर्ष से गाँव में छोटी‑सी दावत भी की गई थी। रंग काला था, तो बस तब से ही नाम करिया पड़ गया, हालाँकि घर के सभी लोगों का रंग उनसे भी गहरा था। उस साल कुररी और पास के इलाक़ों में बहुत बारिश हुई। भयंकर बाढ़ आई और पूरे क्षेत्र की खड़ी फ़...