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कुछ किस्से कहानियाँ - करिया - Hindi Stories - Re Kabira 113

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-- o Re Kabira 113 o --  करिया जबलपुर के एक वन्य अभ्यारण्य में मेरी मुलाक़ात करिया चौकीदार से हुई। उम्र साठ के पार, चेहरे पर संघर्ष की रेखाएँ और आँखों में जीवन की अनकही कहानियाँ। चार हफ़्तों तक कई सुबह वह मिलता रहा—धीरे‑धीरे पहचान बनी, और फिर इधर‑उधर की बातें भी होने लगीं। मैं वहाँ प्रवासी पक्षियों की तस्वीरें लेने जाता था। कैमरा और इस शौक को देखकर वह बार‑बार पूछता—“इससे होता क्या है? पैसे मिलते होंगे? सरकारी नौकरी है या प्राइवेट? दो‑चार लाख का कैमरा होगा?” उसके सवालों में जिज्ञासा भी थी और जीवन के व्यावहारिक अनुभवों की झलक भी। जवाब देते‑देते हम दोनों के बीच एक सहज आत्मीयता जन्म ले चुकी थी। करिया का जन्म 1964 या 65 में राखी के आस‑पास कुररी गाँव में हुआ था। वह उनके कुल में 20 साल बाद, 14 लड़कियों के बाद पहला लड़का था—माता‑पिता की पाँचवीं संतान। बहुत ख़ुशी और हर्ष से गाँव में छोटी‑सी दावत भी की गई थी। रंग काला था, तो बस तब से ही नाम करिया पड़ गया, हालाँकि घर के सभी लोगों का रंग उनसे भी गहरा था। उस साल कुररी और पास के इलाक़ों में बहुत बारिश हुई। भयंकर बाढ़ आई और पूरे क्षेत्र की खड़ी फ...

बार-बार जन्म लेता रहा तू - Hindi Poetry - Re Kabira 111

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-- o Re Kabira 111 o --  बार-बार जन्म लेता रहा तू  खूब धूम मची, 2 दशक - 14 लड़कियों के बाद कुल में लड़का जन्मा तू,   रंग काला, बोलना सीखा नहीं—करिया कहलाया तू। फसल बह गई, घर बिक गया जिस बरस आया तू, अभी चलना सीखा नहीं, गोद में ही पुरे बचपन कोसा गया तू।   मिट्टी ही तेरे खेल खिलौने, उसी में हँसता तू,   दूर से ही पटाखे सुन दिवाली पर खुश होता तू।   फटी किताबों के चित्रों में ही खोया रहा तू,  (उनमे ही अपने ख़्वाब बनाये तूने) नंगे पाँव मीलों स्कूल तक दौड़ता रहा तू।   समझ न सका क्यों कक्षा के बाहर बैठाया गया तू,   कई बार बिना वजह चोर कहलाया तू।  कितने घरों की देहरी पार न कर पाया तू,   मंदिर के बाहर ही मन्नतों के धागे बाँध आया तू।   नमक पानी आधी रोटी, कितनी बार भूखा रोया, सोया तू,  कभी तानों से, कभी गालियों से बौखलाया तू।   लातें सहकर चुप अपने ही घर छुप गया तू,   हर रात सवालों के साथ अँधेरे में रोया तू। हर बार लगा क्यों सब से इतना अलग है तू,  परीक्षा के फॉर्म कुरेदते रहे...