Hindi Poem - Ram - मैंने राम को देखा - Re Kabira 127
मैंने राम को देखा
न मंदिर में देखा, न महलों में देखा
न मूरत में देखा, न सूरत में देखा
न सागर की गहराइयों में देखा, न हिमालय की ऊंचाइयों में देखा
न मंत्रों में देखा, न ग्रंथों में देखा
न रत्नों में देखा, न मालाओं में देखा
न चंदन में देखा, न भभूतों में देखा
न सरयू में देखा, न गंगा में देखा
न रामायण में देखा, न अयोध्या में देखा
न भक्ति भजनों में देखा, न शक्ति गर्जनों में देखा
मैंने राम को देखा,
पिता की चिंता में, माँ की ममता में,
पत्नी की शिकायत में, बच्चों की चाहत में,
मैंने राम को देखा,
दास लगे तुलसी के नाम में,
सिया से साथ लिखे राम में,
मैंने राम को देखा,
भक्तों के भीतर छुपे हनुमान में,
रावण के जीवन ज्ञान में,
मैंने राम को देखा,
इंसानों के अंदर इंसान में,
मनुष्यों के हृदय मानव मान में,
राम सिया राम,
सिया राम,
जय जय राम।
