Re Kabira 065 - वो कुल्फी वाला

--o Re Kabira 065 o--

वो कुल्फी वाला

वो कुल्फी वाला 

जैसे कल ही की बात हो,
जब सुनते थे हम घंटी वो,
भागे चले आते ले जो पैसे हों,
दूध-मलाई-केसर-पिस्ता कुल्फी ले लो,

घेर लेते थे ठेला दिखलाते चवन्नी उसको,
लड़ते थे सबसे पहले अपनी बारी को,
कभी गिर जाती थी कुल्फी टूट, 
दे देता था दूसरी बोल बेटा उदास मत हो 

आँखों में चमक, मुँह में पानी अब भी आता
चाहे हाथ में कुल्फी हो-न-हो,
बचपन की शरारतें वापस आ जाती, 
देख लाल कपड़े में लिपटे मटके को 

न जाने कहाँ चला गया ठंडी कुल्फी वाला वो,
वो कुल्फी वाला,
याद दिलाता बचपन कुल्फी वाला वो,
वो कुल्फी वाला...


आशुतोष झुड़ेले
Ashutosh Jhureley

--o Re Kabira 065 o--


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