Thursday, 16 January 2020

Re Kabira 046 - नज़र


-o Re Kabira 046 o--



नज़र 

मुश्किलों की फ़ितरत है, आती ही हैं नामुनासिब वक़्त पर
अरे रफ़ीक गलत तो है, थिरका भी है कभी तुम्हारी नज़्म पर

होठों  पर हो वो ग़ज़ल, जो ले जाती थी तुम्हें आसमान पर
मुसीबतें नहीं हैं ये असल, वो ले रही इम्तेहाँ यारों पर

डरते है हम सोच कर, नज़र लग गई ख़ुशियों पर 
बोले रे कबीरा क्या कभी लगी, ख़ुदा की नज़र बंदे पर

*** आशुतोष झुड़ेले  ***

--o Re Kabira 046 o--

No comments:

Post a Comment

Total Pageviews