Hindi Poetry - I know you - हिंदी कविता - मैं तुम्हें पहचानता हूँ - Re Kabira 114
-- o Re Kabira 114 o --
मैं तुम्हें पहचानता हूँ
आज सुबह चाय पीते समय किसी ने दस्तक दी,
न नमस्ते, न राम‑राम—सीधे बोला, “मैं तुमसे बहुत नाराज़ हूँ।”
उसका चेहरा गुस्से में लाल था, तेज़ गहरी साँसें समझ से परे थीं।
मैंने कहा, “तुम कौन हो भई? मैं तो तुम्हें जानता ही नहीं।”
वह बड़े अचरज से बोला, “ये कैसे हो सकता है कि तुम मुझे जानते नहीं?
मैं तुम्हें तुम्हारे बचपन से जानता हूँ।
तुम्हारे इतने सारे इल्ज़ाम हैं मुझ पर—तुम्हे कुछ याद नहीं?”
अच्छी ज़बरदस्ती है, बड़ी मुसीबत है, न जान, न पहचान, चले आते हैं।
मैंने चिड़चिड़ाते हुए कहा, “चलो बताओ,
किसने, कब, कहाँ, कौनसा इल्ज़ाम लगाया?”
एक क्षण का सन्नाटा,
फिर बोला, “कब, कहाँ से शुरु करुँ ... चलो बचपन से याद दिलाता हूँ।”
तुम जबरदस्ती मोहल्ले की क्रिकेट टीम के कप्तान बन जाते,
और जब भी हार होने वाली होती, लड़ाई‑झगड़े शुरू कर,
बेईमानी कर खेल बीच में छोड़कर भाग जाते थे।
दो‑तीन बार हार के बाद बल्ले दूर फेंक तोड़े थे तुमने,
हार स्वीकारने की जगह खेलना छोड़ दिया तुमने
तुम्हारे लिए खेल में हार मानना कितना मुश्किल था, मगर—
नाम मेरा उठाते थे, लोग लांछन मुझ पर लगता थे।
चाचा की दुकान के कर्मचारी ने तुम्हें किसी बात पर फटकारा,
मुझे पता है, तुम्हें पता था कि दोषी तुम हो और गलती तुम्हारी ही थी,
कहीं भूले तो नहीं, तुमने क्या कहा था?
“नौकर हो, नौकर की तरह रहो”
कितना बवाल मचाया था तुमने—
तब भी मैं ही बीच में घसीटा गया। सोचो!
स्कूल में इतिहास की अध्यापिका को बदतमीज़ी से पलटकर जवाब दिया था,
कॉलेज में जूनियर तुम्हारा नाम नहीं ले पाया तो पीट दिया था,
सहकर्मी ने तुम्हारी गलती सुधरवाई तो तुमने जो बोला, मैं दोहरा नहीं सकता,
वो जूते जो तुम्हारी तनख्वाह से महंगे थे—क्यों खरीदे, मैं समझा नहीं सकता,
कितनी बार खिड़कियों के काँच, टेबल-कुर्सी, किसी की नाक तोड़ी,
और जब तुमने बिना सोचे गुस्से में नौकरी छोड़ी—
मैं ही पिसा था।
जो तुमसे सहमत नहीं होते, तुम उनसे ख़फ़ा हो जाते,
यदि कोई बात चुभ जाती, बिना समझाए लोगों से कट जाते।
बच्चों का विरोध तुमसे बर्दाश्त नहीं होता,
बीवी की शिकायत सुनने का तुम्हारे पास समय ही नहीं होता।
कितना नुक़सान किया, कितने रिश्ते तोड़े, कितने दोस्त छोड़े—
इनमें नाम किसका बदनाम हुआ? मेरा!
अब मम्मी‑पापा को दुनिया‑दारी का ज्ञान दे आते हो,
बच्चों पर अपनी अपेक्षाओं का बोझ धरे जाते हो,
बड़ा घर, बड़ी कार, महंगी घड़ी, महंगे शौक—
बड़ा ये, बड़ा वो; महंगा ये, महंगा वो।
जो तुम बेसुध भागे जा रहे हो,
छोटी‑छोटी मीठी यादें, सस्ती खुशियों के पल छोड़ते जा रहे हो—
और नाम मेरा उछालते जा रहे हो।
मैंने कहा, “बस बहुत हुआ,
तुम मुझे इतना जानते हो, पर मैं तुम्हें क्यों नहीं पहचान पा रहा?”
उसने गहरी साँस ली, थोड़ी देर आँख बंद कर सोचा, फिर बोला—
तुम्हारी बेईमानी, बदतमीज़ी, बौखलाहट में,
तुम्हारी इच्छाओं में, अपेक्षाओं में, उपेक्षाओं में—
कोई और नहीं, मैं रहता हूँ।
तुम पैदल चल सकते हो,
पर तुम्हारी ऊँची सवारी में मैं रहता हूँ।
तुम्हें समय कोई भी घड़ी बता सकती है,
पर तुम्हारी महंगी घड़ी की चाहत में मैं रहता हूँ।
मैं, मैं, मैं,
तुम, तुम्हारे इर्दगिर्द तुम ही हो,
पर तुम्हारे मैं, मैं में मैं रहता हूँ।
तुम मुझे जानते नहीं, पर मैं तुम्हें अच्छे से पहचानता हूँ।
मैं अहं हूँ—मैं तुम्हारा अहं हूँ !!!
मैं तुम्हें अच्छे से पहचानता हूँ, मैं तुम्हें पहचानता हूँ।
आशुतोष झुड़ेले
Ashutosh Jhureley
@OReKabira
-- o Re Kabira 114 o --
#हिंदीकहानी #हिंदीब्लॉग #हिंदीलेखन #जीवनदर्शन #आत्ममंथन #प्रेरणादायककहानी #भावनात्मककहानी
#हिंदीसाहित्य #लाइफलेसन #मोटिवेशनलहिंदी #रिश्तोंकीकहानी #मानवस्वभाव #स्वविकास #सोचबदलो
#वायरलहिंदीकंटेंट #हिंदीराइटर्स #हिंदीपोस्ट #जीवनअनुभव #हिंदीक्रिएट