Re Kabira 064 - कुछ सवाल?

--o Re Kabira 064 o--


कुछ सवाल?

खुशियां समिट गयीं, आशाएँ बिखर गयीं
कुछ तो ढूंढ रहा है बंदा?
रिश्ते अटक गए, नाते चटक गए
कुछ न समझे है ये बाशिंदा?

उसूल लुट गए, सुविचार मिट गए 
क्यों नहीं हो रही निंदा?
झूठ जीत गया, सच बदल गया
क्यों नहीं हैं हम शर्मिंदा?

दुआयें गुम गयीं, आशीर्वाद कम गया
किसे पुकारे अब नालंदा?
बहुत तप हो गए, रोज़ व्रत हो गए
किसे भक्ति दिखाये रे काबिरा, रे गोविंदा?

सुकून चला गया, चैन न रह गया
कैसे हैं लोग यूँ ज़िंदा?
लालच बस गयी, तृष्णा रह गयी
कैसे निकालोगे ये फंदा?

शहर बस गए, गांव घट गए
कहाँ बनेगा मेरा घरौंदा?
ख़्वाब रह गए, सपने बह गए
कहाँ भटक रहा परिंदा?


आशुतोष झुड़ेले
Ashutosh Jhureley

--o Re Kabira 064 o--


Popular posts from this blog

Re Kabira - सर्वे भवन्तु सुखिनः (Sarve Bhavantu Sukhinah)

बार-बार जन्म लेता रहा तू - Hindi Poetry - Re Kabira 111

कुछ किस्से कहानियाँ - बेंदी - Hindi Stories - Bendi - Re Kabira 116