Hindi Poem - Tearsmith - हिंदी कविता - अश्रु-गढ़िया - Re Kabira 0135
अश्रु-गढ़िया अगर अश्रु सच में मोती होते, तो लुट रहे होते, कोई छीन लेता, कोई चुरा लेता, जिसका जैसा ढंग होता, वैसे — मेरे विचारों को, मेरे सपनों को, मेरे भावों को, मेरी भावनाओं के कुएँ को सुखा देता, खाली कर देता। न सुख होता, न दुःख होता, नम न होतीं प्रेम से आँखें, शायद सागर इतना गहरा न होता। जब मेरा मन पसीज जाता, खीज से तिलमिलाता, आनंदित हो झूमता, तो गढ़वाने पड़ते अश्रु, महँगा बहुत सौदा होता, दलालों का मेला लगा होता। "अश्रु-गढ़िया" व्यवसाय बड़े फायदे का होता, सबके अपने गढ़िये होते ओ रे कबीरा! पता नहीं, कौन मेरा अश्रु-गढ़िया होता! आशुतोष झुड़ेले Ashutosh Jhureley @OReKabira -- o Re Kabira 135 o --