Bundeli Poem - Oh Dear River - बुंदेली कविता - ओ री नदिया - Re Kabira 132a (Hindi Translation)
ओ री नदिया कल-कल छल-छल खनकती चहकती मधुर संगीत लिए कहीं दूर से झूमती हुई यात्रा करती आ रही है संग अपने अनगिनत किस्से कहानियाँ गीत गाथाएँ प्रथा परंपराओं को संजो ला रही है कल-कल छल-छल उछलती कूदती पर्वतों को चीर घाटियों तो तराशती हुई मुस्कुराती बहती आ रही है जहाँ से निकलती वहाँ से माटी का रस फूलों की सुगंध जन की उमंग को साथ ला रही है कल-कल छल-छल मिलती मिलाती धाराओं को मोड़ती झरनो को जोड़ती हुई कहीं मिल कहीं मिला आ रही है प्रकृति प्रवृति आकर प्रकार चरित्र स्वभाव कितने रूप कितने स्वरूपों को सजा ला रही है कल-कल छल-छल न बांधती न बंधती जब बादल फटे पहाड़ ढहे चिढ़ जाती छिड़ जाती झुँझलाती हुई क्रोधित प्रलय बरपाती आ रही है प्रवाह ही धर्म बहाव ही कर्म रोष में संतोष में कर्त्तव्य दायित्व के बोझ को निभाती आ रही है कल-कल छल-छल लड़ती झगडती चट्टानों को कंकड़ पहाड़ों को रेत बनाती हुई तट तारती पट पारती आ रही है...