Hindi Poem - Yantra - Mandala - हिंदी कविता - यंत्र - मंडल - Re Kabira 133

Hindi Poem - Yantra - Mandala - हिंदी कविता - यंत्र - मंडल - Re Kabira 133

यंत्र

मंदिर में आज
अलग ही रस था
केवल घंटों की गूँज
अगरबत्ती की गंध
मंत्रोच्चरण के बीच
भगवा ओढे भिक्षु
आँगन में रंगीन
महल बना रहे थे

एकाग्रत सधे हाथ
तप में लीन ध्यान मग्न
सम्भलित संतुलित
रेत के हर कण से
प्रकृति के हर रंग से
धरा पर समतल
महल के कमरे
दीवार सजा रहे थे

रेत के महीन कणो से
पत्थर के नर्म रंगों से
स्नेह संयम संकल्प से
तप धैर्य परिश्रम से
शायद !
जीवन का अर्थ
समझा रहे थे
वो जीवित महल
एक यंत्र बना रहे थे

हर एक कण
श्वास का प्रतिक था
हर एक रंग
उत्पन्न विचार थे
महल के बीच मे "मैं"
चार द्वार
विवेक-करुणा-दृढ़ता-शुद्धता
चार दीवार
सत्य-असत्य-जीवन-मृत्यु
चारों ओर ज्ञान-अंतर्ज्ञान 

सुन्दर अलौकिक दृश्य था
दिव्य भव्य महल बना था
हर्षोल्लास से उत्त्सव मना था
मन मोहक महल सजा था
पर ये क्या?
क्यों उन्होंने धीरे-धीरे 
महल को .. यंत्र को .. मंडल को !
झाड़ू से मिटा दिया?

कुछ नहीं बदला,
और सब बदल गया 
कुछ नित्य नहीं
कुछ स्थिर नहीं
जो बनाया वो मिटेगा
जो आया वो जाएगा
न तुम कुछ लेकर आये थे 
न तुम कुछ लेकर जाओगे 

मंदिर में सब कुछ वैसा ही था
वही घंटो की गूँज 
वही अगरबत्ती की गंध
वही भगवा ओढे मंत्र दोहराते भिक्षु
फिर नए यंत्र की तैयारी में लग जाते 
फिर रेत लाते, फिर रंग बनाते 
फिर मंडल बनाते और मिटाते 
फिर मंत्र मुग्ध ध्यान लीं हो जाते 

मोह कष्ट दायी है कठोर माया 
जो महल तुमने सजाये
वो तुम ही स्वं मिटाओगे
जीवन का अर्थ समझा दिया!
क्या लेकर आये थे 
क्या लेकर जाओगे 
तुम माटी से बने हो 
माटी में मिल जाओगे!

बौद्ध भिक्षु रेत से बने जटिल कला मंडल को कई दिनों या कई हफ्तों की मेहनत के बाद इसलिए मिटा देते हैं क्योंकि यह जीवन की नश्वरता और अनित्यता का प्रतीक है। मंडल, यन्त्र या महल बनाने और मिटाना, इस सत्य को दर्शाता है कि इस संसार में कुछ भी स्थाई नहीं है और हर चीज़ को एक दिन नष्ट होना है। और  कलाकृति से मोह या अहंकार न रखने और उससे खुद को अलग करने का अभ्यास करने के लिए इसे मिटाया जाता है। मंडल को धीरे-धीरे मिटाते हुए अपने मोह और भावों से मुक्त होने का प्रयास करते हैं। अन्तः इस रेत को बहती धारा में प्रवाहित कर दिया जाता है ताकि सकार ऊर्जा पूरी प्रकृति और ब्रह्मांड में फैल सके। ऊर्जा रेत संग जहाँ से आई वहाँ वापस चली जाती है। रेत फिर धरा में लीन हो जाती है।  


आशुतोष झुड़ेले
Ashutosh Jhureley
@OReKabira

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