Hindi Poem - We Tend To Forget - हिंदी कविता - हम भूल जाते हैं - Re Kabira 0134
हम भूल जाते हैं
जब हम वहाँ से चले थे,
तब क्यों चले, किस लिए चले, पता न था।
हम भूल जाते हैं—
आज जहाँ हैं, जिधर जा रहे हैं, वहाँ के लिए निकले ही नहीं थे।
जब रात को डर के मारे माँ से चिपक कर सो जाते थे,
तब भी माँ चिंता करती थी।
हम भूल जाते हैं—
आज भी वह अपनी नींद से ज़्यादा हमारी नींद का ध्यान रखती है।
जब पापा पीछे होते, तो पहलवान बन कर चलते थे,
तब वह पीछे से सब देख रहे हैं, हमें पता था।
हम भूल जाते हैं—
आज भी वह परछाईं बन कर चुपचाप साथ चल रहे हैं।
जब छोटे भाई के साथ शरारत करने में उपलब्धि लगती थी,
तब हर जीत के बाद गले में हाथ डाल कर घूमना आदत थी।
हम भूल जाते हैं—
आज भी चाहे हार हो या जीत, वह कंधा वहीं बराबरी में खड़ा है।
जब संगिनी ऑफिस से आकर १० मिनट शांति से बैठना चाहती है,
तब मैं अपना रोना ले सिर पकड़ कर बैठ जाता हूँ।
मैं भूल जाता हूँ—
आज तक वह दसियों नौकरियाँ संभाल रही है और मैं एक से जूझ रहा हूँ।
जब मम्मी-पापा की डाँट विद्रोही बना देती थी,
तब दोस्त सही और वे गलत लगते थे।
हम भूल जाते हैं—
आज हमारे बागी बच्चे बिल्कुल हमारे जैसे ही हैं।
जब घर का रोज़ का खाना बोरियत और बेस्वाद लगता था,
तब बाहर की चटपटी चाट के लिए मन उछल पड़ता था।
हम भूल जाते हैं—
आज तक घर का खाना क्यों बाज़ार में नहीं बिकता है।
जब चार पंक्तियाँ डायरी में लिखने के लिए समय नहीं निकालना पड़ता था,
तब लिख कर, काट कर, फिर लिख कर किस्सों को संजोया था।
हम भूल जाते हैं—
आज भी वह कलम किताबों में दबी मेज़ पर पड़ी है।
जब अपनी बोली को छोड़ परायी भाषा को अपनाना ज़रूरी था,
तब बुंदेली बस खिचयाके गारीयन में निकलत हती।
हम भूल जात हैं—
आजऊँ हमाई बोली हमखाँ हमाए नियरे धरे है।
जब दोस्तों के जमवाड़े से सुबह से रात तक शोर रहता था,
तब अकेलापन शब्दकोश में शायद होता ही नहीं था।
हम भूल जाते हैं—
आज हम भीड़ में अकेले हैं, पर दोस्तों का शोर वहीं नुक्कड़ पर बसा है।
जब हमारे शौक, अच्छे-बुरे अनुभव हमारे सपनों को सजाते थे,
तब ज़िंदगी में रंगों का मेला लगा होता था।
हम भूल जाते हैं—
आज भी हमारे वे सपने कहीं गहरे दबे हैं, जिन्हें कोई कभी-कभी जगा देता है।
जब जाने-अनजाने में हमने खुद को ही दफ़ना दिया था,
तब किसी ने हमें हमसे फिर मिला दिया था।
हम भूल जाते हैं—
आज भी जब हम खो जाते हैं, वो कटे-पिटे डायरी के किस्से हमको हमसे मिला देते हैं।
जब हम वहाँ से चले थे,
तब क्यों चले, किस लिए चले, पता न था।
हम भूल जाते हैं—
आज जहाँ हैं, जिधर जा रहे हैं, वहाँ के लिए निकले ही नहीं थे।
आज भी माँ अपनी नींद से ज़्यादा हमारी नींद का ध्यान रखती है।
आज भी पापा परछाईं बन कर चुपचाप साथ चल रहे हैं।
आज भी चाहे हार हो या जीत, भाई कंधा वहीं बराबरी में खड़ा है।
मैं भूल जाता हूँ—
आज तक मेरी संगिनी दसियों नौकरियाँ संभाल रही है और मैं एक से जूझ रहा हूँ।
आज हमारे बागी बच्चे बिल्कुल हमारे जैसे ही हैं।
आज तक घर का खाना क्यों बाज़ार में नहीं बिकता है।
आज हम भीड़ में अकेले हैं, पर दोस्तों का शोर वहीं नुक्कड़ पर बसा है।
जब चार पंक्तियाँ डायरी में लिखने के लिए समय नहीं निकालना पड़ता था,
तब लिख कर, काट कर, फिर लिख कर किस्सों को संजोया था।
हम भूल जाते हैं—
आज भी वह कलम किताबों में दबी मेज़ पर पड़ी है।
जब अपनी बोली को छोड़ परायी भाषा को अपनाना ज़रूरी था,
तब बुंदेली बस खिचयाके गारीयन में निकलत हती।
हम भूल जात हैं—
आजऊँ हमाई बोली हमखाँ हमाए नियरे धरे है।
जब हमारे शौक, अच्छे-बुरे अनुभव हमारे सपनों को सजाते थे,
तब ज़िंदगी में रंगों का मेला लगा होता था।
हम भूल जाते हैं—
आज भी हमारे वे सपने कहीं गहरे दबे हैं, जिन्हें कोई कभी-कभी जगा देता है।
