Hindi Memoir- Diwali of Milloniganj - हिंदी संस्मरण - मिलौनीगंज की दिवाली - Re Kabira 0137
मिलौनीगंज की दिवाली
मिलौनीगंज के उस पुराने घर में दिवाली कभी सिर्फ एक दिन का त्योहार नहीं होती थी; वह तो एक पूरा बीस दिनों का उत्सव था, जो हमारे बड़े से घर और बिखरे परिवार को कुछ दिनों के लिए एक साथ ले आता था।
जैसे ही नवरात्रों की रौनक कम होने लगती, दिवाली की तैयारियाँ शुरू हो जातीं। गुड़हाई तिराहे से पंडाल सिमटने लगते और दशहरे के पुतलों की झाँकी निकली ही होती थी कि बब्बा चाचाओं को उन दीवारों को दिखला देते जहाँ मरम्मत की ज़रूरत होती और इशारा करते जहाँ से चूने की पपड़ी झड़ रही होती। "यहाँ अभी छपाई-पुताई बाकी है।" इसके बाद अगले 20 दिनों तक घर में सफाई और सजावट का अभियान छिड़ जाता।
पूरा घर उथल-पुथल हो जाता। चारों तरफ एक निरंतर उत्साह का शोर छा जाता। हवा में गीले चूने, धूल और सालों-साल के दबे विवाद हर साल की तरह फिर निकल आते। दादी, मम्मी, बुआ और चाचियाँ पीतल-काँसे के हांडी-बर्तनों को चमकाने में लग जातीं; बड़बड़ाते हुए ही सही, पुराने पतीले और बर्तन फिर से नए हो जाते। छत पर एक अलग ही नज़ारा होता। धूप सेकने के लिए तकिए, रजाई और गद्दे कतार में बिछा दिए जाते और रस्सियों पर चादरें और परदे हवा में लहरा रहे होते। उन्हीं के बीच छत का कोई न कोई कोना ढूँढ़कर बड़ी, पापड़ और आम का अचार भी अपनी जगह बना ही लेते थे।
एक-एक करके कमरों की छपाई, पुताई और लिपाई की जाती। इस सफाई अभियान का मज़ा केवल बच्चों को आता, उनके लिए यह किसी खजाने की खोज जैसा होता था। किसी कोने में, पलंग के नीचे या अलमारी के पीछे सालों से गुमे हुए सामान अचानक मिल जाते। कोई पुराना खिलौना मिलता, तो कोई भूली हुई चाबी, चिल्लड़ सिक्के या फिर चोरी-छिपे रखी मिठाई जिसमे फफूंद लग जाती। ये सामान कुछ दबे हुए भेद भी खोलते, पुराने मतभेद फिर छिड़ते और किसी न किसी बहाने से कोई आसमान सिर पर उठा लेता, तो किसी के सिर पर आसमान गिर जाता। कमरों के रंगों के चयन की लड़ाई हमेशा बब्बा ही यह कहकर सुलझाते— "आसमानी नीला कर दो।"
बाहर मिलौनीगंज चौगड्डा, छोटा फुहारा, बड़ा फुहारा और कमानिया बाज़ार की रंगत बदल जाती। सुबह से शाम तक चहल-पहल रहती और हर शाम बाज़ारों में इतनी भीड़ उमड़ पड़ती कि पैर रखने की जगह भी नहीं बचती। पूरा बाज़ार रंग-बिरंगे झालर-झंगड़ों से सज जाता, रोशनी से अलग-अलग रेखाचित्र सभी जगह उभर आते। घर को झालरों से दुल्हन की तरह सजाया जाता और भगवान की तस्वीरों पर ताजे फूलों की मालाएँ चढ़ाई जातीं। धूपबत्ती और अगरबत्ती की गंध चारों ओर से लगातार आती रहती।
उधर रसोई से पकवानों की मीठी खुशबू मन को पूरे समय ललचाती रहती। सभी के पसंदीदा पकवान, नमकीन और मिष्ठान बनते - गुजिया, मठरी, खाजे, पपड़ी, लड्डू, पेड़ा और बर्फी। मेहमान, रिश्तेदार और परिचित— कभी-कभी अपरिचित भी— सभी से मिलना-मिलाना होता और घर में लोगों की आवाजाही शुरू हो जाती। धनतेरस के दिन नए कपड़े, थोड़े बर्तन और कुछ सोने-चांदी के गहने घर आते। नरक चौदस पर सुबह 4 बजे स्नान का आदेश होता था; कुछ इसका पालन करते थे और कुछ समय रहते डाँट खाकर 'नरक के दर्शन' कर लेते थे। सभी को दिवाली के शुभ दिन का बेसब्री से इंतज़ार रहता था।
जैसे ही आँगन गोबर और मिट्टी से लिपता और उस पर खूबसूरत रंगोली सजती, दीये धुलकर तैयार हो जाते; धनतेरस, नरक चौदस और फिर देखते ही देखते दिवाली की सुबह थोड़ी ठंडक लेकर आ जाती। दिवाली की सुबह घर में एक अजीब सी 'भड़भड़ाहट' होती। बब्बा और बड़े लोग पूजा का स्थान, मंदिर, तिजोरी और बही-खाते सजाने में व्यस्त होते और बच्चे अपनी आतिशबाजी और पटाखों के बँटवारे में लग जाते। शाम होते ही इस घर से और उस घर से सारे दादा-दादी, चाचा-चाची, बुआ और भाई-भतीजे सभी इकट्ठे हो जाते। जो देर से आता, वह डाँट खाता। बब्बा की खाली, पर भारी तिजोरी खुलती और महालक्ष्मी की पूजा शुरू होती। सरस्वती, गणेश और लक्ष्मी जी का आवाहन होता और पूजा “जय सिया राम, जय लक्ष्मण हनुमान” की गूँज से पूरी होती।
जहाँ तक मुझे याद है, पूजा का मुहूर्त हमेशा देर रात का होता था; बच्चे बेचैन और बड़े चिड़चिड़े रहते। आँखें मिठाई के डिब्बों पर और दिमाग में पटाखे होते। जैसे ही पूजा, हवन और आरती संपन्न होती, प्रसाद मिलता और साथ में 'दिवाली के पैसे'— नए और कड़क 2 या 5 रुपये के नोट बड़ों के आशीर्वाद के साथ मिल जाते।
इसके बाद तो मानो मोहल्ले में पटाखों का एक तूफान आ जाता। कोई 100 की लड़ जलाता, कोई 10 हजार की और कोई लाखों की; एक होड़ सी लग जाती। आसमान में आतिशबाज़ी और रोशनी का ऐसा मेला लगता कि लगता जैसे चारों ओर खुशियों की बारिश हो रही हो। भोज और पेट-पूजा के बाद, देर रात जब धुआँ छँटता, तो दादी, मम्मी, बुआ और चाची एक गहरी सांस लेकर बैठतीं। कई दिनों की थकान के बाद आखिरकार उन्हें और पूरे घर को कुछ पलों का विराम मिलता।
लेकिन दिवाली यहाँ खत्म नहीं होती थी। अगले दिन गोवर्धन पूजा और फिर भाई दूज होती। बाई के लिए गोवर्धन पूजा दिवाली जितनी ही बड़ी थी। हम लोगों को एक बार फिर ताजा गोबर लेने भेज दिया जाता और बाई गोवर्धन पर्वत की आकृति आँगन में बनाती थीं। पूजा होती और फिर हमारे हिस्से थोड़ी मिठाई आती। पापा और चाचाओं के लिए भाई दूज का दिन काफी व्यस्त होता था। ढेर सारी बुआओं और बहनों का आना-जाना लगा रहता। मेरे और भाई के लिए उसका कोई खास महत्व नहीं था। उसके बाद सभी लोग फिर से रोज़मर्रा के कामों में व्यस्त हो जाते और दिवाली को भूल जाते।
आज जब पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो सोचता हूँ कि अब वो बीस दिनों की दिवाली कहाँ होती है? अब तो त्योहार एक वीकेंड में सिमट कर रह गया है और केवल पार्टियों में तब्दील हो गए हैं। पर जब भी साल का यह महीना आता है, मेरी आँखें मूँदते ही मैं वापस मिलौनीगंज के उस घर के आँगन में पहुँच जाता हूँ। मैं उस घर में पहुँच जाता हूँ जो वहाँ अब है ही नहीं, पर यादें वहीं हैं। मिलौनीगंज की मेरी दिवाली अभी भी, आज भी वहीं है।
