Hindi Poem - Diwali of Milloniganj - हिंदी कविता - मिलौनीगंज की दिवाली - Re Kabira 0136

Hindi Poem - Diwali of Milloniganj - हिंदी कविता -  मिलौनीगंज की दिवाली - Re Kabira 0136



मिलौनीगंज की दिवाली

नवरात्रों के पंडाल अभी समेटे नहीं,
दशहरे की कल ही निकली थी झाँकी,
बब्बा ने चाचाओं को दिखा दिए,
कमरे जहाँ पुताई थी अभी बाँकी।

पूरा घर उथल-पुथल हो जाता,
निरंतर उत्साह का शोर छा जाता,
हांडी-बर्तन चमकाने में लग जातीं,
बऊ-दादी-मम्मी-बुआ और चाची।

धूप देख रहे होते तकिए-रजाई-गद्दे,
छतों पर सूख रहे होते चादर-परदे,
बड़ी-पापड़-अचार भी कहीं न कहीं,
ढूँढ़ ही लेते थे अपना स्थान वहीं।

एक-एक करके कमरों की सफाई होती,
दीवारों के रंगों पर कभी लड़ाई होती,
धूल में लिपटे मिल जाते कुछ गुमे सामान,
खुलते भेद, छिड़ते मतभेद, गिरता आसमान।

चौगड्डे-बाजारों में चहल-पहल बढ़ती,
हर शाम दुकानों पर भीड़ उमड़ पड़ती,
घर झालर-झंगड़ से दुल्हन से सजते,
भगवान की तस्वीरों पर फूल-माला चढ़ते।

रसोई में मीठी खुशबू होती पकवानों की,
पूरे दिन आवाजाही लगी होती मेहमानों की,
आ गए नए कपड़े, कुछ गहने, थोड़े बर्तन,
सजेंगे, स्वर्ण छवि होगी, लगेंगे शैतान सज्जन।

लिप गया गोबर से आँगन, सज गई रंगोली,
धनतेरस, नरक चौदस, लो आ गई दिवाली,
सुबह से शाम तक सब हैं भड़भड़ाए हुए,
बब्बा पूजा, हम पटाखों की तैयारी में लगे हुए।

इस घर से उस घर से आ गए जन सब,
शुरू होती तिजोरी खोल लक्ष्मी पूजा तब,
सरस्वति ,गणेश, लक्ष्मी का होता आवाहन,
गाते जय सिया राम, जय लक्ष्मण हनुमान।

मुहूर्त होता था हमेशा पूजा का देर रात,
सहन नहीं होती थी भूख, मिठाई की आस,
जैसे ही संपन्न होती पूजा, मिलता प्रसाद,
मिल जाती थोड़ी दिवाली साथ आशीर्वाद।

फुलझड़ी पटाखों का खूब मचता शोर,
खुशियों की बारिश होती चारों ओर,
जैसे भरता पेट हल्ले पर लगता विराम 
दादी मम्मी करती शायद थोड़ा आराम। 

बची अभी है गोवर्धन पूजा, भाई दोज,
फिर चले जाते बहार से आये थे लोग,
कुछ दिनों तक छा जाता बिल्कुल सन्नाटा,
कामों में सब व्यस्त न कोई आता न जाता। 

अब कहाँ होती 20 दिनों की वो दिवाली,
सप्ताहांत की पार्टी में मानते सारे त्यौहार,
नकली फूल, बाजार से लाते मिस्ठान पकवान
चार लोग पूजा करते, रीलों में सजाते माकन।  

'ओ रे कबीरा' अब नहीं होती वैसी दिवाली
जैसी होती थी मिलौनीगंज के घर की दिवाली!


आशुतोष झुड़ेले
Ashutosh Jhureley
@OReKabira

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